भोपाल । 18 सालों तक कांग्रेस की राजनीति करने के बाद आखिरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम ही लिया। बीजेपी दफ्तर में जैसे ही सिंधिया ने बीजेपी में शामिल होने का ऐलान किया प्रदेश के कई सियासी समीकरण बदल गए। न सिर्फ ग्वालियर-चंबल बल्कि मालवा के उन इलाकों में जहां सिंधिया समर्थक काफी संख्या में है, कांग्रेस और बीजेपी की जमीनी राजनीति में नए रिश्तों की कहानी शुरु हो गई।
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दिल्ली में ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होते ही भोपाल में जब पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रेस कांफ्रेंस की, तो सबसे पहले उन्होंने सिंधिया की दादी राजमाता सिंधिया को याद किया। ऐसा करके शिवराज शायद पुराने रिश्तों के सहारे नए संबंधों की शुरुआत करना चाहते हैं। वे जानते हैं कि सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने से कांग्रेस के ही नहीं बीजेपी के जमीनी हालात में बदलाव हो सकता है। सालों से महल का विरोध कर रहे प्रभात झा, जयभान सिंह पवैया के साथ ग्वालियर चंबल से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा, की राजनीति पर सिंधिया के प्रभाव का असर पड़ सकता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपनी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया की अनबन की खबरें भी कई बार सुर्खियां बनती रहीं। लेकिन नए घटनाक्रम से ये रिश्ते भी मजबूत होते दिख रहे हैं।
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ज्योतिरादित्य सिंधिया का वर्चस्व सिर्फ ग्वालियर और चंबल में ही नहीं है, बल्कि मालवा के इंदौर, देवास, उज्जैन और शाजापुर में भी सिंधिया समर्थकों की अच्छी खासी तादाद है। सिंधिया के बीजेपी में आने से इन इलाकों की राजनीति भी काफी बदल सकती है। यदि कांग्रेस के लिहाज से देखें, तो ग्वालियर-चंबल इलाके में सिंधिया के बाद सबसे बड़े नेता डॉ गोविंद सिंह, के पी सिंह, अशोक सिंह हैं, जो यहां कांग्रेस को ताकत दे सकते हैं। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि निचले स्तर तक संगठन में कोई टूट-फूट न हो। हालांकि दिग्विजय सिंह और उनके बेटे जयवर्धन सिंह गुना के राघौगढ़ से आते हैं लेकिन उनका असर इस इलाके में कम है। सांवेर तुलसी सिलावट,सागर से गोविंद राजपूत सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ चुके हैं, लेकिन इन इलाकों में कांग्रेस के दूसरे नेताओं का असर होने के कारण यहां पार्टी को नुकसान कम होने की संभावना है।
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सिंधिया के बीजेपी में जाने से एक संकट प्रदेश स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व का भी हो सकता है, क्योंकि माना जा रहा था कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बाद सिंधिया ही पार्टी की कमान संभाल सकते हैं। लेकिन अब ये जिम्मेदारी अगली पीढ़ी के नेताओं को दी जा सकती है।