निलंबन अवधि के दौरान भत्ता: सीबीआई अदालत ने पूर्व एनसीबी अधिकारी के खिलाफ आदेश बरकार रखा

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निलंबन अवधि के दौरान भत्ता: सीबीआई अदालत ने पूर्व एनसीबी अधिकारी के खिलाफ आदेश बरकार रखा

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  • Publish Date - May 7, 2026 / 08:59 PM IST,
    Updated On - May 7, 2026 / 08:59 PM IST

नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी की एक विशेष सीबीआई अदालत ने स्वापक नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी) के एक पूर्व अधिकारी के खिलाफ आरोप तय करने के फैसले को बरकरार रखा है।

एनसीबी के इस पूर्व अधिकारी पर तीन निजी कंपनियों में कार्यरत रहने के बावजूद निलंबन अवधि के दौरान निर्वाह भत्ता प्राप्त करके सरकारी एजेंसी को धोखा देने का आरोप है।

पूर्व अधीक्षक रवि कुमार राणा ने इस वर्ष फरवरी में मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी एक आदेश के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की थी, जिसपर विशेष न्यायाधीश अतुल कृष्ण अग्रवाल सुनवाई कर रहे हैं। उक्त आदेश में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 471 (जाली दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करना) और 168 (लोक सेवक द्वारा अवैध रूप से आय अर्जित करने में शामिल होना) के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया था।

एनसीबी ने अपनी शिकायत में कहा कि राणा को 17 मई 2015 को निलंबित कर दिया गया था और विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन्हें 13 जुलाई 2019 को जबरन सेवानिवृत्त कर दिया गया था।

शिकायत के अनुसार, निलंबन की अवधि के दौरान आरोपी ने निर्वाह भत्ता प्राप्त किया, जबकि वह गुरुग्राम स्थित लीला एंबियंस और एचपी इंडिया तथा उबर इंडिया सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड में कार्यरत था।

इसमें कहा गया है कि एचपी इंडिया में नौकरी पाने के लिए राणा ने दो जाली दस्तावेज, एक अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) और सरकारी एजेंसी से अपने इस्तीफे की स्वीकृति संबंधी पत्र जमा किये थे।

जांच के बाद, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने आरोप पत्र दाखिल किया, जिसमें कहा गया कि पर्याप्त मौखिक और दस्तावेजी सबूत हैं जिनसे यह साबित होता है कि राणा ने एनसीबी को धोखा दिया और तीन निजी कंपनियों में कार्यरत रहने के दौरान सरकारी एजेंसी से निर्वाह भत्ता प्राप्त किया। साथ ही, उसने एक कंपनी में नौकरी पाने के लिए दो झूठे, जाली और मनगढ़ंत दस्तावेज जमा किये थे।

मजिस्ट्रेट अदालत के द्वारा आरोप तय किये जाने के बाद, आरोपी ने मौजूदा पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।

न्यायाधीश अग्रवाल ने छह मई के अपने आदेश में कहा कि राणा ने निलंबन के दौरान निर्वाह भत्ता का दावा करने के लिए कम से कम दो प्रमाण पत्र जमा किये थे, जिसमें कहा गया था कि वह लाभ, पारिश्रमिक या वेतन के लिए किसी भी व्यवसाय, पेशे या कारोबार में शामिल नहीं था।

उन्होंने कहा कि लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार, राणा अलग-अलग समय पर तीन कंपनियों में कार्यरत था, ‘‘इसलिए प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि आरोपी या याचिकाकर्ता द्वारा उक्त फर्जी प्रमाण पत्र जमा कर एजेंसी को धोखा दिया गया और उसने अवैध रूप से निर्वाह भत्ता का दावा किया था।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि एनसीबी को आरोपी द्वारा धोखा दिया गया है, क्योंकि उसने स्वीकार किया है कि वह 16 जनवरी 2017 से 25 अक्टूबर 2019 की अवधि के दौरान विभिन्न निजी फर्म में कार्यरत था, और इसके बावजूद निलंबन के दौरान उसे निर्वाह भत्ता प्राप्त हुआ था।’’

अदालत ने पूर्व अधिकारी की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि भत्ता उसके बैंक खाते में अंतरित किया जा रहा था।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘मेरा यह मानना है कि उक्त आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, और पुनरीक्षण याचिका में कोई ठोस आधार नहीं होने के कारण यह खारिज की जाती है।’’

भाषा सुभाष रंजन

रंजन