यमुना बाजार में बेदखली नोटिस: निवासियों को सदियों पुरानी नदी तट संस्कृति के विलुप्त होने का डर

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यमुना बाजार में बेदखली नोटिस: निवासियों को सदियों पुरानी नदी तट संस्कृति के विलुप्त होने का डर

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  • Publish Date - May 7, 2026 / 08:53 PM IST,
    Updated On - May 7, 2026 / 08:53 PM IST

(वर्षा सागी)

नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) दिल्ली के निगम बोध घाट के नजदीक यमुना बाजार में दिये गए बेदखली नोटिस के बीच श्मशान घाट पर कर्मकांड कराने वाले पुरोहितों और आम निवासियों की चिंता बढ़ गई है, जो पीढ़ियों से नदी से जुड़ी परंपराओं को आगे बढ़ाने और महाभारत काल के दौर से इस इलाके के आबाद होने का दावा करते हैं।

दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) ने बृहस्पतिवार को कश्मीरी गेट इलाके में यमुना बाजार के निवासियों को बेदखली नोटिस जारी किए।

बेदखली नोटिस के मुताबिक निवासियों को अपना सामान हटाने और स्वेच्छा से क्षेत्र खाली करने के लिए 15 दिन समय दिया गया है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि ऐसा न करने पर, ‘अतिक्रमण’ हटाने के लिए ध्वस्तीकरण अभियान चलाया जाएगा।

नोटिस जारी होने के बीच निवासियों का कहना है कि उन्हें न केवल अपने घर खोने का डर है, बल्कि बेदखली के साथ सदियों से चली आ रही नदी तट की पूरी संस्कृति के लुप्त हो जाने का भी डर है।

यमुना बाजार के पास निगमबोध घाट पर पुरोहित सुनील शर्मा ने कहा, ‘‘मेरा परिवार लगभग 200 वर्षों से यहां रह रहा है, और हमारे पास ऐसे नक्शे और अभिलेख भी हैं जो एक सदी से अधिक समय से यहां हमारी उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं। हमने अपने पूर्वजों से सुना है कि ये घाट कभी जाति के आधार पर विभाजित थे और परिवारों की यमुना से जुड़ी अपनी पारंपरिक भूमिकाएं थीं।’’

शर्मा ने बताया कि उनका परिवार घाटों के पास ही पुरोहित के रूप में यमुना की आरती करता है, निगमबोध घाट पर अंतिम संस्कार कराता है और नदी से जुड़े अन्य अनुष्ठान करता है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह सिर्फ हमारे लिए एक जगह नहीं है, यह हमारी और शहर की विरासत है।’’

शर्मा, जो यमुना घाट पंडा एसोसिएशन से भी जुड़े हुए हैं, ने कहा कि लगभग 60 परिवार ऐसे हैं जिनका इतिहास 100 साल से भी अधिक पुराना है और वे अब भी इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।

नदी किनारे जीवनरक्षक के तौर पर काम करने वाले स्थानीय निवासी सुरेंद्र (47) ने बताया कि यमुना से उनके परिवार का रिश्ता पीढ़ियों पुराना है।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारे पूर्वज हमें बताते थे कि हमारा परिवार राजा अकबर के समय से यहां रह रहा है और हमारे पास कम से कम 150 वर्षों से यहां हमारी उपस्थिति के प्रमाण हैं। मेरे पिता पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए थे, क्योंकि उन्होंने दिल्ली से मथुरा तक तैरकर यात्रा की थी, जो उस समय कोई और नहीं कर सकता था।’’

इस क्षेत्र के इतिहास के संबंध में, इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने कहा कि निगमबोध घाट के पास स्थित नीली छतरी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है और इस स्थल के आसपास लंबे समय से मानवीय गतिविधियों का प्रमाण है।

उन्होंने कहा, ‘‘निगमबोध घाट के पास स्थित नीली छतरी मंदिर एक बहुत प्राचीन स्थल है। इस क्षेत्र से जुड़े सबसे पुराने ठोस ऐतिहासिक प्रमाण मुगल काल के हैं।’’

भाषा

शफीक धीरज

धीरज