नयी दिल्ली, 27 जनवरी (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने सोमवार को 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान हुई आसूचना ब्यूरो (आईबी) के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और चार अन्य लोगों को दी जाने वाली सजा पर अपना फैसला 31 जुलाई तक के लिए सुरक्षित रख लिया।
पांच दोषियों को दी जाने वाली सजा की अवधि पर दलीलें सुनने के बाद, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने अपना फैसला शुक्रवार तक के लिए सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान, दिल्ली पुलिस ने अदालत से सभी पांचों दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने का अनुरोध किया और कहा कि शर्मा पर लगातार हमला करते हुए वे ‘‘जानवरों जैसी हरकतों पर उतर आए थे’’।
विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने अदालत में कहा कि दोषियों ने शर्मा का अपहरण किया, बेरहमी से मारपीट की और उनकी हत्या कर दी। उन्होंने कहा कि शर्मा की मौत के बाद भी वे उन पर वार करते रहे।
उन्होंने कहा, ‘‘अंकित शर्मा का अपहरण किया गया और बेरहमी से पीटकर उनकी हत्या कर दी गई। उनके शरीर पर कुल 51 घाव पाए गए, जिनमें से 18 घाव धारदार हथियारों से किए गए थे। इस्तेमाल किए गए हथियारों से इस अपराध के पीछे की मंशा और अपराधियों की क्रूरता का पता चलता है। वे जानवरों जैसी हरकत पर उतर आए थे। शर्मा की मौत के बाद भी वे उन पर हमला करते रहे।’’
पांडे ने कहा कि अपराध जघन्य और क्रूर था तथा दोषियों को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘यह निर्मम हत्या थी। वारदात के समय ये लोग कसाई बन गए थे। शर्मा के शरीर पर ‘अंडरवियर’ के अलावा एक भी कपड़ा नहीं था। इन लोगों को जेल में रखा जाना चाहिए और मृत्युदंड दिया जाना चाहिए।’’
पांडे ने कहा, ‘‘इस हत्या के तरीके को अलग-थलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि दंगों में मारे गए 53 लोगों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इसलिए, वह संदर्भ भी महत्वपूर्ण है, जिसमें ये दंगे हुए थे।’’
यह भी कहा गया कि शर्मा ने कभी किसी को उकसाने का काम नहीं किया, बल्कि दोषी खुद ही उन्हें मारने पर उतारू हो गए।
पांडे ने कहा, ‘‘मेरा विनम्र निवेदन है कि इस अपराध को करने का तरीका और दोषियों का व्यवहार ऐसा था कि उनके प्रति कोई नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। इस मामले में कोई उकसावा नहीं था। उन्होंने जानबूझकर निर्मम हत्या की। इस मामले में, सज़ा तय करने की नीति का झुकाव मौत की सज़ा की ओर होना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जिन लोगों ने दंगों के दौरान लोगों पर दया नहीं दिखाई, उन्हें दया की गुहार लगाने का अधिकार नहीं होना चाहिए।’’
हुसैन की ओर से पेश हुए वकील राजीव मोहन और तारा नरूला ने पुलिस के तर्क का विरोध किया और कहा कि उनके मुवक्किल की कोई खास भूमिका नहीं बताई गई है। उन्होंने कहा कि साथ ही, इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि 11 आरोपियों में से छह को इस मामले में बरी किया जा चुका है।
वकील मोहन ने कहा, ‘‘हर दोषी व्यक्ति को मौत की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। पहले अपराध की गंभीरता बढ़ाने वाली परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए और उसके बाद सज़ा कम करने वाली परिस्थितियों पर। दोषी ठहराए जाने के मामले में, 11 आरोपियों में से छह को बरी किया जा चुका है।’’
उन्होंने दलील दी कि मृत्युदंड केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में दिया जाता है, और इस मामले में फ़ैसले में घटना की जगह पर भीड़ की मौजूदगी का तो ज़िक्र है, लेकिन दोषियों की ख़ास भूमिका के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।
वकील ने कहा, “सिर्फ़ चोटों के आधार पर मौत की सज़ा तय नहीं की जा सकती। जेल में हिरासत के दौरान उसका (हुसैन का) व्यवहार अच्छा था। अदालत ने 91 गवाहों के बयान दर्ज किए थे, जिसके बाद 11 आरोपियों में से सिर्फ़ पांच को अदालत ने दोषी ठहराया।”
हुसैन के वकील ने यह भी कहा कि पूरे मुकदमे के दौरान, अदालत के सामने आपराधिक साजिश (भादंसं की धारा 120बी के तहत) का कोई सबूत पेश नहीं किया गया।
मोहन ने कहा, ‘‘पुलिस खुद हिंसक भीड़ को काबू नहीं कर पाई, और ऐसी स्थिति में हत्या के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उसे सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए।’’
वकील नरूला ने दलील दी कि हुसैन अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य है और उसके परिवार में उसकी पत्नी व तीन बच्चे हैं।
नरूला ने कहा, ‘‘जब उसने (हुसैन) समर्पण किया, तब तीनों बच्चे कम उम्र के थे। हालांकि राउज़ एवेन्यू अदालत में अधिकार क्षेत्र न होने की वजह से उसकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई थी, लेकिन इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह समर्पण करने के लिए बाहर आया था। जैसे-जैसे उसकी बेटी बड़ी हो रही है, उसे उसके मार्गदर्शन की ज़रूरत होगी।’’
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सजा के संबंध में फैसला 31 जुलाई तक सुरक्षित रख लिया।
गत 13 जुलाई को अदालत ने हुसैन और चार अन्य लोगों को शर्मा की हत्या का दोषी ठहराया था। 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भीड़ ने शर्मा पर हमला कर दिया था, जिनका शव बाद में एक नाले में मिला था।
अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराए जाने संबंधी फ़ैसले में कहा था कि हुसैन भारी हथियारों से लैस उस भीड़ का हिस्सा था जो हिंदुओं के प्रति नफ़रत की भावना से दंगा, आगज़नी और लूटपाट करने के लिए इकट्ठा हुई थी, तथा जिसने ‘‘अत्यंत बर्बर और लगातार हमला’’ कर शर्मा की हत्या कर दी।
हुसैन को भादंसं की धाराओं 302 (हत्या), 365 (किसी व्यक्ति को गुप्त रूप से और गलत तरीके से बंधक बनाने के इरादे से अगवा करना), 147 (दंगा करना), 148 (घातक हथियार के साथ दंगा करना), 153ए (दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 188 (सरकारी कर्मचारी द्वारा जारी आदेश का पालन न करना) के साथ धारा 149 (गैर-कानूनी जमावड़ा) के तहत दोषी ठहराया गया था।
भाषा
नेत्रपाल नरेश
नरेश