प्रयागराज, 25 मार्च (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कानपुर में 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से जुड़े आपराधिक मुकदमे को रद्द करने का अनुरोध करने वाली नौ आरोपियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई सामूहिक हिंसा को ‘‘नरसंहार’’ और ‘‘मानवता के खिलाफ अपराध’’ करार देते हुए अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी और मूल पुलिस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होना, मुकदमों को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता ने मंगलवार को पारित आदेश में कानपुर नगर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में इन नौ आरोपियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों को रद्द करने से इनकार कर दिया।
इन सभी मामलों में घटनाओं के तुरंत बाद प्राथमिकियां दर्ज की गई थीं। हालांकि, सभी मामलों में आरोपियों के खिलाफ सबूत नहीं होने का हवाला देते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी।
बाद में केंद्र सरकार ने सिख विरोधी दंगों के मामलों की जांच करने के लिए न्यायमूर्ति नानावटी आयोग गठित किया। इसके बाद, उच्चतम न्यायालय ने इन मामलों की जांच के लिए एसआईटी गठित की। उक्त निर्देशों के अनुपालन में जांच की गई, गवाहों के बयान लिए गए और इन आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए गए जिन्हें संबंधित अदालत ने संज्ञान में लिया।
इन आपराधिक मुकदमों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि चूंकि इस मामले के मूल रिकॉर्ड (प्राथमिकी, अंतिम रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट आदि) उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए मुकदमे की कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हो सकती।
आरोपियों द्वारा यह भी दलील दी गई कि एसआईटी द्वारा दर्ज गवाहों के बयान उनकी पहचान पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं और इससे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष प्रक्रिया के उनके अधिकार का उल्लंघन होता है।
वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने इन याचिकाओं का यह कहते हुए विरोध किया कि उच्चतम न्यायालय ने मानवता के खिलाफ इन अपराधों का न्यायिक संज्ञान लिया और यह जानते हुए भी कि मूल रिकॉर्ड लापता हैं, इन मामलों की पुनः जांच के लिए एसआईटी गठित की है।
राज्य सरकार के वकील ने सज्जन कुमार बनाम सीबीआई के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का भी हवाला दिया जिसमें निचली अदालत को मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था और कहा गया था कि महज देरी के आधार पर मुकदमों की सुनवाई बंद नहीं की जा सकती।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इन मामलों में दोषियों को बचाने के लिए जल्दबाजी में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई।
अदालत ने कहा, “मौजूदा मामले में यह घटना, कई घटनाओं की बड़ी शृंखला का हिस्सा है जो पूरे देश में सिख समुदायों के खिलाफ हुई। इन घटनाओं की प्रकृति एक विशेष समुदाय के खिलाफ एक नरसंहार जैसी थी जिसमें कई निर्दोष लोगों की हत्या की गई, लोगों को जिंदा जलाया गया, मकानों और संपत्तियों में आग लगा दी गई और लूटपाट की गई।”
अदालत ने आगे कहा, “इतने व्यापक पैमाने पर मानवता के खिलाफ हुए ऐसे अपराध पर किसी का ध्यान नहीं गया और लगभग सभी मामलों में दोषियों को बचाने के लिए जल्दबाजी में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई।”
भाषा सं राजेंद्र
धीरज
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