असम चुनाव: असमिया पहचान की सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय दलों के बीच खींचतान

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असम चुनाव: असमिया पहचान की सुरक्षा के लिए क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय दलों के बीच खींचतान

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  • Publish Date - March 22, 2026 / 05:03 PM IST,
    Updated On - March 22, 2026 / 05:03 PM IST

गुवाहाटी, 22 मार्च (भाषा) नयी सरकार के चुनाव में जुटे असम में क्षेत्रवाद अब भी एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है क्योंकि यह राज्य दशकों से ‘बाहरी लोगों’ मुख्य रूप से अवैध प्रवासियों के खतरे से अपनी ‘पहचान’ की रक्षा की चिंता से जूझ रहा है।

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की प्रासंगिकता पर पिछले कुछ सालों में सवाल उठने लगे हैं, क्योंकि असम गण परिषद (अगप) समेत सभी प्रमुख क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों के साथ हाथ मिला रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि राष्ट्रीय दलों द्वारा ‘असमिया जातियताबाद’ (असमिया राष्ट्रवाद) के प्राथमिक मुद्दे को ‘हथियाना’ और उनके पास उपलब्ध अधिक व्यापक संसाधनों के कारण क्षेत्रीय दलों को चुनावी अस्तित्व के लिए उनका साथ देना पड़ा है।

उन्होंने कहा कि पिछले चार दशकों में दो सरकारों का नेतृत्व करने के बावजूद क्षेत्रीय ताकतों के लिए एक मजबूत मार्ग प्रशस्त करने में अगप की ‘विफलता’ के कारण भी ये क्षेत्रीय दल ‘हासिये पर’ पहुंच गये हैं।

स्तंभकार और राजनीतिक विश्लेषक ब्रोजेन डेका ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘असमिया लोगों के लिए संस्कृति, भाषा और पहचान की रक्षा हमेशा से ही चिंता का विषय रही है। और विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसका अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल किया है।’’

उन्होंने कहा कि बांग्लादेश मूल के ज्यादातर बांग्ला भाषी मुसलमानों से मूल निवासियों के लिए उत्पन्न ‘खतरा’ हाल के दशकों में सबसे प्रमुख रहा है और आज भी बना हुआ है।

डेका ने दावा किया कि इस मुद्दे को सुलझाने के वादे के साथ चुनाव लड़े गए हैं और सरकारें बनाई गई हैं, यहां तक ​​कि मौजूदा चुनाव भी इसी उद्देश्य से हो रहे हैं।

स्तंभकार ने कहा, ‘‘अगर आप वर्ष 2016 के चुनाव में भाजपा की भारी जीत को देखें, तो चुनावी नारा ‘जाति, माटी, भेति’ (समुदाय, भूमि, घर) था, जो स्थानीय पहचान की रक्षा का सीधा संकेत था। और 2026 के चुनाव में भी, राज्य (सरकार से) यह आशा है कि वह अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ कार्रवाई करे।’’

नगांव विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर नव कुमार महंत ने कहा कि अवैध विदेशियों की पहचान करने और उन्हें निर्वासित करने के इसी आश्वासन के साथ अगप ने 1985 और 1996 में दो बार सरकारें बनाईं। उन्होंने कहा कि यह पार्टी उन नेताओं द्वारा बनाई गई थी जो घुसपैठ विरोधी, छह साल लंबे असम आंदोलन में सबसे आगे थे।

उन्होंने कहा, ‘‘यह एक क्षेत्रीय पार्टी थी जिसने दो कार्यकाल तक सरकार का नेतृत्व किया। लेकिन अब यह भाजपा की एक छोटी सहयोगी पार्टी मात्र बनकर रह गई है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में हमने देखा है कि पार्टी कुल 126 सीट में से केवल 26 सीट पर ही चुनाव लड़ रही है। ’’

उन्होंने कहा, ‘‘और इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इस साल इसके 26 उम्मीदवारों में से 13 मुस्लिम हैं और उनमें से कई बांग्ला भाषी हैं। एक ऐसा समुदाय जिस पर अगप पहले अवैध प्रवासी होने के संदेह करती थी।

महंता ने कहा कि वैसे तो अगप प्रारंभ से ही धर्मनिरपेक्ष सोच वाली पार्टी रही लेकिन उसने बांग्लाभाषी मुसलमानों से हमेशा दूरी बनाये रखी।

विश्लेषकों के अनुसार रायजोर दल और असम जातीय परिषद जैसी अन्य क्षेत्रीय पार्टिर्यों का गठन इस दशक की शुरुआत में असमिया पहचान के लिए लड़ने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन वे विपक्षी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुकी हैं, एक ऐसी पार्टी जिस पर मूल रूप से ‘वोट बैंक’ के लिए राज्य में अवैध प्रवासियों की समस्या पैदा करने का आरोप लगाया गया था।

डेका का मानना ​​है कि क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय दलों के साये में आने की नींव तब पड़ी जब राष्ट्रीय दलों ने खुद को ‘जातियताबाद के चैंपियन’ के रूप में पेश करना शुरू किया।

उन्होंने कहा, ‘‘इसकी शुरुआत पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से हुई, जिन्होंने एनआरसी को अद्यतन करने जैसे कार्यों और अपने मशहूर बयान ‘बदरूद्दीन अजमल कौन है?’ के जरिए इस मूल मुद्दे को प्रभावी ढंग से अपने हाथ में ले लिया।’’

गोगोई ने यह टिप्पणी 2006 के राज्य चुनाव से पहले की थी, जब इत्र कारोबारी अजमल ने अपनी पार्टी एआईयूडीएफ बनाई थी। यह पार्टी बांग्ला भाषी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में चुनावी सफलता का स्वाद चख रही है।

डेका ने कहा, ‘‘कुछ साल बाद भाजपा ने भी ऐसा ही किया जब उसने ‘जाति, माटी, भेती’ की रक्षा करने का संकल्प लिया।’’

भाषा

राजकुमार संतोष

संतोष