कोलकाता, 10 मई (भाषा) दक्षिण-पश्चिम कोलकाता के मटियाब्रज में नौ मई को शाम ढलते ही, भीड़ भरे रेस्तरां के अंदर टेलीविजन स्क्रीन पर शुभेंदु अधिकारी के पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के दृश्य बार-बार दिखाए गए। यह एक ऐसा क्षण था, जो हाल तक एक ऐसे राज्य में राजनीतिक रूप से अकल्पनीय प्रतीत होता था, जहां दशकों से भाजपा विरोधी भावना बलवती थी।
कोलकाता और आसपास के इलाकों के कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में प्रतिक्रिया न तो नाटकीय थी और न ही उग्र। वहां सतर्कता भरी खामोशी थी।
एक ऐसा समुदाय, जो राज्य की आबादी का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा है, उसके लिए भाजपा सरकार के आगमन ने चिंता, व्यावहारिकता और सतर्क उम्मीदों का एक मिला-जुला भाव पैदा कर दिया है।
नयी सरकार के सत्ता में आने के बाद मुसलमानों के बीच प्रतिनिधित्व और सुरक्षा को लेकर आशंकाएं हैं, खासकर इसलिए क्योंकि भाजपा ने विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया।
हालांकि, उनके बीच अंदर ही अंदर भावना यह भी है कि इस फैसले को लोकतांत्रिक तरीके से स्वीकार किया जाना चाहिए और बयानबाजी के बजाय शासन के माध्यम से उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
‘ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन’ के महासचिव मोहम्मद कमरुज्जमान ने कहा, “हम लोकतांत्रिक शासन, नेतृत्व और समानता में विश्वास करते हैं। लोकतंत्र में सरकार को सभी के लिए काम करना चाहिए।”
उन्होंने कहा, “पहले ममता बनर्जी थीं और अब लोकतांत्रिक जनादेश के माध्यम से शुभेंदु अधिकारी सत्ता में आए हैं। हम सरकार से ‘राजधर्म’ का पालन करने और सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने की अपेक्षा करते हैं।”
यह भावना बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं के बदलते मिजाज को दर्शाती है, जो पिछले एक दशक में बनी राजनीतिक मान्यताओं को तोड़ देने वाले चुनाव के बाद सामने आई है। वर्षों से मुसलमान मतदाता बड़े पैमाने पर तृणमूल कांग्रेस के पीछे एकजुट रहे थे। वर्ष 2021 के चुनाव में, यह एकजुटता भगवा लहर के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में काम आई।
यह चुनाव अलग तरह से हुआ। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों और दक्षिण 24 परगना के कुछ हिस्सों में अल्पसंख्यक मतदाता एकसमान रूप से तृणमूल के पीछे नहीं गये। इस समुदाय के कुछ वर्ग कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ चले गए, जबकि हुमायूं कबीर के एजेयूपी और आईएसएफ जैसे स्थानीय संगठनों ने भी सत्तारूढ़ पार्टी के आधार में सेंध लगाई।
मुर्शिदाबाद में लगभग दो-तिहाई आबादी मुस्लिमों की है तथा वहां तृणमूल की सीट 2021 की 20 से घटकर इस बार नौ रह गई। भाजपा की सीट दो से बढ़कर नौ हो गईं। मालदा और उत्तर दिनाजपुर में भी इसी तरह के बदलाव देखने को मिले।
मुस्लिम विधायकों की संख्या में मामूली गिरावट आई है, जो 44 से घटकर 40 हो गई है, लेकिन उनमें तृणमूल का दबदबा काफी कमजोर हो गया है। अब छह मुस्लिम विधायक तृणमूल और भाजपा से इतर अन्य दलों से हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे कई कारण थे। अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्ग प्रतीकात्मक राजनीति और तृणमूल के भीतर स्थानीय गुटबाजी से उब गये थे।
कई निर्वाचन क्षेत्रों में, कांग्रेस और वामपंथी उम्मीदवारों ने इतना समर्थन जुटा लिया कि उन्होंने उस ‘भाजपा विरोधी गुट’ को छिन्न-भिन्न कर दिया, जो कभी पूरी तरह एकजुट हुआ करता था।
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण भी एक प्रमुख मुद्दा बन गया।
राज्य भर में मतदाता सूची से लगभग 91 लाख नाम हटाए गए। हालांकि, कोई ऐसी जानकारी नहीं है कि उनमें किस धर्म के कितने लोग हैं, लेकिन विपक्षी दलों का अनुमान है कि हटाए गए लोगों में से एक बड़ा हिस्सा उन मुस्लिमों का है, जो उन जिलों में केंद्रित हैं जो पारंपरिक रूप से टीएमसी के समर्थक रहे हैं।’
राजनीतिक विश्लेषक मोइदुल इस्लाम ने कहा, “भाजपा की तात्कालिक प्राथमिकता शासन और विकास होगी। घबराने की कोई वजह नहीं है। अल्पसंख्यकों को शायद कोई अतिरिक्त राजनीतिक लाभ न मिले, लेकिन एक समान अवसर मिल सकता है, जहां विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।”
अल्पसंख्यक मामलों के विभाग के बारे में पूछे जाने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने इस सवाल का सीधा जवाब देने से परहेज किया कि इसका नेतृत्व कौन करेगा। लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विकास को धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
भाषा राजकुमार दिलीप
दिलीप