भाखड़ा-ब्यास विवाद: केंद्र ने बकाये के कैशलेस समाधान का प्रस्ताव दिया; न्यायालय की पंजाब को फटकार

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भाखड़ा-ब्यास विवाद: केंद्र ने बकाये के कैशलेस समाधान का प्रस्ताव दिया; न्यायालय की पंजाब को फटकार

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  • Publish Date - July 30, 2026 / 08:58 PM IST,
    Updated On - July 30, 2026 / 08:58 PM IST

नयी दिल्ली, 30 जुलाई (भाषा) केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि हिमाचल प्रदेश और पंजाब एवं हरियाणा के बीच एक नये ‘कैशलेस फार्मूले’ के आधार पर भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) की परियोजनाओं से जुड़े बकाये के भुगतान का एक सौहार्दपूर्ण समाधान निकाला जा सकता है।

केंद्र के इस प्रस्ताव के बाद, भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की परियोजनाओं से हिमाचल प्रदेश को 1966 से लंबित बकाये के भुगतान का रास्ता साफ होता दिख रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, बीबीएमपी एक नवंबर 2011 के बाद भाखड़ा ब्यास परियोजना से हिमाचल प्रदेश के हिस्से की बिजली के लिए 7.19 प्रतिशत का भुगतान कर रहा है, जबकि पंजाब और हरियाणा ने बीबीएमपी परियोजनाओं के बकाये का भुगतान नहीं किया है, जो 1,306. करोड़ यूनिट है।

केंद्र के प्रस्ताव के अनुसार, क्योंकि बिजली की दर को लेकर राज्यों में सहमति नहीं बन पाई, इसलिए पंजाब और हरियाणा द्वारा हिमाचल प्रदेश को भुगतान नकद के बजाय बिजली के रूप में किया जाएगा।

प्रस्ताव में यह भी तय किया गया है कि हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा को करीब 420 करोड़ रुपये के बकाया का भुगतान नहीं करेगा। इस राशि को 1,306.6 करोड़ यूनिट बिजली के बकाये में समायोजित किया जाएगा।

केंद्र के प्रस्ताव के तहत पंजाब और हरियाणा को हिमाचल प्रदेश को 1,306.6 करोड़ यूनिट में से 1,200 करोड़ यूनिट से अधिक बिजली का भुगतान मौद्रिक रूप में नहीं, बल्कि ऊर्जा के रूप में करना होगा।

इसके अलावा, जिस पर्वतीय राज्य (हिमाचल) से ब्यास नदी प्रवाहित होती है, उसे पंजाब और हरियाणा को पूंजीगत लागत के मद में 400 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान नहीं करना होगा।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा की सरकारों ने सैद्धांतिक रूप से केंद्र के प्रस्ताव पर सहमति जताई है, लेकिन पंजाब सरकार ने इसका विरोध किया है।

शीर्ष अदालत ने प्रस्ताव से सहमत नहीं होने को लेकर पंजाब सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि उसे न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं करने की आदत है।

उच्चतम न्यायालय ने पंजाब सरकार से प्रस्ताव पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा और इसके लिए दो सप्ताह का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त के लिए तय कर दी।

सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने कहा कि सरकार ने पूरी तरह से नकदी रहित समाधान का सुझाव दिया है, क्योंकि यदि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के आधार पर आगे बढ़ा जाएगा तो कोई समाधान नहीं निकल पाएगा।

उन्होंने कहा, ‘‘कुछ न कुछ करना होगा।’’ उन्होंने कहा कि पक्षकारों ने एक फार्मूला तय करने में काफी समय लगाया है और अब सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के प्रयास किए जा रहे हैं।

वहीं, पंजाब सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता निदेश गुप्ता ने कहा कि उन्हें बकाया भुगतान के लिए तय की जाने वाली बिजली दर पर आपत्ति है।

उन्होंने कहा कि 2.5 रुपये प्रति यूनिट की दर बहुत अधिक है और यह उचित दर होनी चाहिए, अन्यथा राज्य को करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

पीठ ने कहा कि यदि पंजाब सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए सहमत नहीं होता है तो न्यायालय मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई कर आदेश पारित करेगा।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हिमाचल प्रदेश के पास पंजाब और हरियाणा की तरह राजस्व जुटाने के उतने स्रोत नहीं हैं। इन तथ्यों पर विचार करने की जरूरत है। नदी उसी राज्य से बहती है और बांध भी वहीं स्थित हैं।’’ अदालत ने पंजाब को याद दिलाया कि इस मामले में न्यायालय का आदेश उपलब्ध है और उसका पालन करना होगा।

हिमाचल प्रदेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, महाधिवक्ता अनूप रतन और अतिरिक्त महाधिवक्ता वैभव श्रीवास्तव ने कहा कि राज्य 2011 में शीर्ष अदालत द्वारा तय शर्तों के अनुसार बकाया पाने का हकदार है।

सिब्बल ने दलील दी, ‘‘15 वर्षों से, 1966 से लंबित बकाया का भुगतान नहीं किया गया है, जबकि इस अदालत ने इसे तय किया था। पंजाब को केंद्र से ऋण मिला था, लेकिन उसने उसे वापस नहीं किया।’’

हरियाणा सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने कहा कि राज्य सैद्धांतिक रूप से प्रस्ताव से सहमत है, लेकिन वह राज्यों के बीच होने वाली बातचीत का हिस्सा बनना चाहता है।

सूत्रों ने कहा कि करीब 60 वर्षों बाद भाखड़ा-ब्यास परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश के हिस्से को लेकर विवाद के समाधान की उम्मीद जगी है।

पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के बाद संपत्तियों के बंटवारे से जुड़े अंतरराज्यीय विवाद का दशकों तक समाधान नहीं निकलने के बाद हिमाचल प्रदेश ने 1996 में उच्चतम न्यायालय में मूल वाद दायर किया था। राज्य ने दावा किया था कि वह बीबीएमबी परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत हिस्सा पाने का हकदार है।

केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के बीच विवाद को अदालत से बाहर सुलझाने में विफल रहने के बाद उच्चतम न्यायालय ने 27 सितंबर 2011 को इस मामले में आदेश पारित किया था।

उस फैसले के अनुसार, बीबीएमबी परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश का हिस्सा 7.19 प्रतिशत, पंजाब का 51.80 प्रतिशत और हरियाणा का 37.51 प्रतिशत तय किया गया था। राजस्थान के हिस्से पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा, जबकि केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का हिस्सा 3.50 प्रतिशत तय किया गया था।

भाषा सुभाष सुरेश

सुरेश