नयी दिल्ली, 15 मार्च (भाषा) केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय से कहा है कि उसे केंद्रीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा प्रस्तावित 10 सदस्यीय उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति पर कोई आपत्ति नहीं है, जिसे अरावली की पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा तय करने का कार्य सौंपा गया है।
शीर्ष अदालत में दाखिल एक हलफनामे में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने उच्च-स्तरीय विशेषज्ञ समिति के लिए सुझाए गए नामों का समर्थन किया है।
इस समिति में भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण(जीएसआई) और भारतीय सर्वेक्षण विभाग से जुड़े वर्तमान तथा सेवानिवृत्त नौकरशाहों के साथ-साथ शिक्षाविद भी शामिल हैं।
हलफनामे में कहा गया है, “पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय आदरपूर्वक निवेदन करता है कि प्रस्तावित उच्च-स्तरीय समिति के गठन के लिए सुझाए गए उपरोक्त नामों पर यदि यह न्यायालय विचार करता है, तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। यह भी बताया जाता है कि फिलहाल मंत्रालय के पास उक्त समिति में शामिल करने के लिए कोई अतिरिक्त नाम नहीं है।”
प्रस्तावित समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद की वर्तमान निदेशक कंचन देवी करेंगी। अन्य सदस्यों में एफएसआई के पूर्व महानिदेशक सुभाष अशुतोष, जीएसआई के पूर्व निदेशक राजेंद्र कुमार शर्मा, जलवायु एवं उर्जा नीति विशेषज्ञ तेजल कानिटकर, वरिष्ठ शिक्षाविद और जीवन विज्ञान शोधकर्ता जया प्रकाश यादव, वरिष्ठ भूगोलवेत्ता और स्कॉलर तेजबीर सिंह राणा, भारत के पूर्व अतिरिक्त सर्वेयर जनरल, एस. वी. सिंह, गुजरात के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक सी. एन. पांडेय, नगालैंड के पूर्व पीसीसीएफ धर्मेंद्र प्रकाश शामिल हैं।
शीर्ष अदालत ने 29 दिसंबर को अरावली पहाड़ियों की नयी परिभाषा को लेकर उठे विवाद पर संज्ञान लेते हुए 20 नवंबर के अपने एक आदेश को स्थगित कर दिया था, जिसमें इन पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था।
न्यायालय ने सभी खनन गतिविधियों पर भी रोक लगा दी थी।
भाषा जोहेब दिलीप
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