नयी दिल्ली/धनबाद, चार अगस्त (भाषा) केंद्र सरकार द्वारा कोयला चोरी रोकने का अभियान शुरू किये जाने के एक माह बाद केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) ने कई चुनौतियों की ओर इशारा किया है।
सीआईएसएफ ने झारखंड और पश्चिम बंगाल में कोयला खदान प्रबंधन से ‘समय पर पर्याप्त’ ‘लॉजिस्टिक’ सहयोग नहीं मिलने, कर्मचारियों की कमी और ज़रूरी धनराशि एवं कानूनी अधिकारों के अभाव जैसे मुद्दे उठाये हैं।
इस अर्द्धसैनिक बल की क्षेत्रीय इकाइयों ने ‘भारत कोकिंग कोल लिमिटेड’ (बीसीसीएल), ‘ईस्टर्न कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड’ (ईसीएल), ‘सेंट्रल कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड’ (सीसीएल) और दिल्ली में सीआईएसएफ मुख्यालय को पत्र लिखकर इन मुद्दों के बारे में जानकारी दी है।
आधिकारिक सूत्रों तथा ‘पीटीआई-भाषा’ को मिले दस्तावेजों के अनुसार, इन चुनौतियों के बावजूद चार जुलाई को शुरू हुए अभियान के बाद से इस केंद्रीय बल ने 6,171 मीट्रिक टन से ज़्यादा चोरी हुआ कोयला बरामद किया है, 106 अवैध खदानों को सील किया है और 229 प्राथमिकी दर्ज की हैं।
सीआईएसएफ को देश की प्रमुख कोयला खदानों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। केंद्र सरकार ने हाल में सीआईएसएफ को ‘खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957’ (एमएमडीआर) के तहत तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई करने के लिए निर्धारित एजेंसी के रूप में अधिकृत किया है, ताकि उसके अधिकार क्षेत्र में आने वाली कोयला खदानों से कोयले की चोरी रोकी जा सके।
गृह मंत्रालय ने सीआईएसएफ को निर्देश दिया है कि वह कोयले की चोरी बिल्कुल बंद करने का लक्ष्य हासिल करने के लिए कोयला माफ़िया और अपराधियों के ख़िलाफ़ एक विशेष अभियान चलाए।
अधिकारिक सूत्रों ने बताया कि कोयला क्षेत्रीय प्रबंधनों से ‘समय पर पर्याप्त लॉजिस्टिकल सहयोग न मिलने’ की वजह से सीआईएसएफ को कई जगहों पर छापेमारी में सात से दस दिन की देरी करनी पड़ी या उसे टालना पड़ा।
सूत्रों ने बताया कि छापेमारी के दौरान जब्त किए गए सामान और गाड़ियों को रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षित और खास जगहें नहीं हैं। इस अभियान के तहत सीआईएसएफ ने अबतक छोटी और बड़ी मिलाकर लगभग 200 गाड़ियां ज़ब्त की हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ कोयला खदान प्रबंधन ने ‘एक्ट कॉन्ट्रावेंशन सर्टिफिकेट’ (एसीसी) का तय प्रारूप जारी नहीं किया है। इस प्रमाणपत्र में ज़ब्त किए गए सामान और उसकी कीमत का ब्योरा होता है तथा कोयला चोरी के मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए यह एक जरूरी दस्तावेज़ है।
कई जगहों पर, सीआईएसएफ दलों को मामला दर्ज करने और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के सिलसिले में पुलिस और वन विभाग के अधिकारियों से जरूरी ‘सहयोग’ नहीं मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, अपराधियों का पीछा करने और तलाशी अभियान चलाने वाले त्वरित प्रतिक्रिया दलों के लिए कोयला क्षेत्र प्रबंधन की ओर से गाड़ियां भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं।
सूत्रों ने बताया कि जब दूर-दराज और जंगली इलाकों में इस तरह के अभियान चलाए जाते हैं, तो जिला खनन अधिकारी (डीएमओ) की मौजूदगी सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ये अधिकारी आमतौर पर जिला मुख्यालय में तैनात होते हैं।
सूत्रों के अनुसार ऐसी और कई परेशानियां हैं।
भाषा
राजकुमार सुरेश
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