नयी दिल्ली, 22 जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को हिमाचल प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘हम कॉलेजियम की कार्यवाही को लेकर कोई नया ‘भानुमति का पिटारा’ नहीं खोलना चाहते।’’
याचिकाकर्ता ने याचिका में आरोप लगाया था कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति के लिए उनसे कनिष्ठ अधिकारियों के नामों की सिफारिश की गई है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ये ऐसे मामले हैं जिनमें आखिरकार उच्च न्यायालय के कॉलेजियम की अपनी संतुष्टि ही मायने रखती है।
पीठ ने सवाल किया, ‘‘क्या न्यायिक रूप से, उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम से यह कह सकता है कि आप यह करें या वह करें और किसी नाम पर विचार करें? ऐसा नहीं किया जा सकता।’’
शीर्ष न्यायालय ने कहा, ‘‘न्यायिक रूप से, हम उच्च न्यायालय कॉलेजियम या उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम की कार्यवाही को लेकर कोई ऐसी स्थिति पैदा नहीं करना चाहते जिससे नयी और जटिल समस्याएं खड़ी हो जाएं।’’
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने कहा कि याचिकाकर्ता राज्य के सबसे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी हैं और उनकी करीब 10 साल की सेवा शेष है।
पीठ ने टिप्पणी की कि केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति वरिष्ठ है, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वह पदोन्नति की सिफारिश किये जाने के हकदार हैं।
उच्चतम न्यायालय द्वारा याचिका पर सुनवाई से इनकार के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि वह अपनी याचिका वापस ले लेंगे। साथ ही, उन्होंने उच्च न्यायालय के सक्षम अधिकारी से प्रशासनिक स्तर पर उचित राहत मांगने या न्यायिक स्तर पर उपाय खोजने की छूट भी देने का अनुरोध किया।
पीठ ने याचिकाकर्ता के अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।
उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम ने दो जून को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में तीन न्यायिक अधिकारियों- चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी थी।
शीर्ष न्यायालय ने सोमवार को सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि उच्च न्यायालय कॉलेजियम ने याचिकाकर्ता का नाम खारिज कर दिया था।
पीठ ने कहा, ‘‘इस चरण में आपकी उम्मीदवारी को अस्वीकार नहीं किया गया है। कृपया कुछ समय प्रतीक्षा करें।’’
भाषा धीरज अविनाश
अविनाश