नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने स्कूल के भीतर अपने शिक्षक की हत्या के दोषी को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए कहा कि अपराध के समय उसकी कम उम्र फांसी की सजा न देने का एक महत्वपूर्ण आधार है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रिया महेंद्रा, दोषी विवेक कुमार की सजा की अवधि पर सुनवाई कर रही थीं, जिसने उस समय ड्यूटी पर मौजूद अपने शिक्षक की हत्या कर दी थी।
उन्होंने दोषी को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई।
सोमवार को सुनाए गए फैसले में अदालत ने कहा, ‘दोषी इस समय लगभग 28 वर्ष का है और हर मानक के अनुसार वह बहुत युवा है। इसके अलावा, यह नहीं कहा जा सकता कि उसका अस्तित्व समाज के लिए कोई आसन्न खतरा है, और उसके जीवन को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।’
विवेक को आठ सितंबर को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या), 186 और 353 के तहत दोषी ठहराया गया था।
अदालत ने टिप्पणी की कि स्कूल के अंदर शिक्षक की हत्या ‘घृणास्पद और निंदनीय’ थी और इसने ‘गुरु और शिष्य के बीच सदा से चले आ रहे पवित्र संबंध पर गहरा आघात किया।’
हालांकि, अदालत ने कहा कि जब विवेक ने अपराध किया था तब उसकी उम्र 18 साल सात महीने थी, ऐसे में उसके निर्णय लेने की क्षमता (मानसिक स्थिति) की तुलना पूरी तरह से परिपक्व वयस्क से करना उचित नहीं होगा।
अदालत ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि इस मामले में अंतरिम जमानत पर बाहर रहने के दौरान विवेक हत्या के एक अन्य मामले में भी शामिल था।
हालांकि, अदालत ने कहा कि उस मामले की प्राथमिकी के अनुसार, उसकी भूमिका केवल अन्य सह-आरोपियों को उकसाने और मृतक को पकड़ने तक सीमित थी, जबकि चाकू मारने का काम सह-आरोपी ने किया था। उस मामले में उसे जमानत मिल गई थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार मृत्युदंड केवल ‘दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों’ तक ही सीमित होना चाहिए, जबकि कारावास सामान्य नियम (मानक) है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जब दोषी ने अपने स्कूल शिक्षक की हत्या जैसा जघन्य अपराध किया, तब वह अपनी किशोरावस्था में था।’
भाषा सुमित नरेश
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