नयी दिल्ली, 23 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र और नालसा से उस जनहित याचिका पर उनका पक्ष जानना चाहा है जिसमें ज़रूरतमंद लोगों के लिए मुफ़्त फ़ॉरेंसिक विशेषज्ञ की मदद की मांग की गई है, ताकि वे ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ के तहत अदालत में इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश कर सकें।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने दो वकीलों- जीशान अखलाक और अमन भिड़े द्वारा दायर जनहित याचिका पर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) और केंद्र को नोटिस जारी किए।
पीठ ने माना कि पहली नज़र में, विशेषज्ञ की मदद लेने के साधन न होने के कारण जरूरतमंदों का इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश न कर पाना उनके न्याय पाने के अधिकार पर असर डालता है।
अदालत ने 19 अगस्त को कहा, ‘‘इसलिए हम नालसा से इस मामले पर विचार करने और अदालत को किसी ऐसी संभावित योजना के बारे में बताने के लिए कहते हैं जो लागू की जा सके।’’
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत, किसी मामले में इलेक्ट्रॉनिक सबूत पेश करने के लिए किसी व्यक्ति को विशेषज्ञ द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र की जरूरत होती है, और हो सकता है कि हाशिए पर रहने वाले, कमजोर और गरीब वर्ग के लोगों के पास यह मदद पाने के लिए जरूरी पैसे नहीं हों।
याचिका में कहा गया है कि आरटीआई आवेदन के जवाब में, नालसा ने साफ तौर पर कहा था कि बीएसए, 2023 की धारा 63 के अनुसार प्रमाणपत्र तैयार करने के लिए मुफ़्त कानूनी सहायता पाने के हकदार लोगों को ‘विशेषज्ञ की मदद का कोई प्रावधान नहीं’ है।
अदालत ने इस मामले को अक्टूबर महीने के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
भाषा वैभव नेत्रपाल
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