न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की आलोचना की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया

न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की आलोचना की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया

न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की आलोचना की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया
Modified Date: April 18, 2026 / 04:28 pm IST
Published Date: April 18, 2026 4:28 pm IST

नयी दिल्ली, 18 अप्रैल (भाषा) शीर्ष अदालत ने अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करने की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ उच्च न्यायालयों को आगाह करते हुए कहा है कि ‘‘उच्च न्यायालय से जिला न्यायिक अधिकारियों के संरक्षक के रूप में भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है’’।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने किरायेदारी से जुड़े एक आपराधिक मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने वाले कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए यह टिप्पणी की।

पीठ ने कहा कि यह विवाद मुख्य रूप से दीवानी प्रकृति का है और तकनीकी आधार पर लगभग आठ साल बाद जमानत आदेश को रद्द करना उच्च न्यायालय के लिए उचित नहीं था।

पीठ ने कहा, ‘‘हाल ही में यह एक चलन बन गया है कि उच्च न्यायालय द्वारा पर्यवेक्षी, अपीलीय या पुनरीक्षण सुनवाई के दौरान दिए गए न्यायिक आदेशों में न्यायिक अधिकारियों की निंदा की जाए और उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां/कड़ी आलोचना दर्ज की जाए।’’

उसने कहा, ‘‘राज्य में ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ होने के नाते, उच्च न्यायालय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के संरक्षक के रूप में कार्य करे।’’

उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा दिए गए आदेश में खामियां पाए जाने पर न्यायिक व्यवस्था में संबंधित अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल या अपमानजनक टिप्पणी करना तत्काल प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह की अपमानजनक टिप्पणियां/आलोचनाएं न्यायिक अधिकारी के करियर को बर्बाद कर सकती हैं और साथ ही पूरे जिला न्यायपालिका का मनोबल भी गिरा सकती हैं।’’

भाषा

शफीक सुरेश

सुरेश


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