खुली लड़ाई में हर व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

खुली लड़ाई में हर व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय

खुली लड़ाई में हर व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार : इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: July 24, 2026 / 02:00 am IST
Published Date: July 24, 2026 2:00 am IST

प्रयागराज, 23 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि खुली लड़ाई में हर व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है। इसी के साथ अदालत ने 1984 में भूमि के विवाद में हुए संघर्ष में चार महिलाओं को बरी कर दिया और दो व्यक्तियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

उक्त निर्णय देते हुए न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने कहा, “जब साक्ष्य से यह स्पष्ट ना हो कि संघर्ष में कौन सा पक्ष हमलावर था तो यह माना जाएगा कि यह एक खुली लड़ाई थी जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है।”

उच्च न्यायालय ने यह फैसला ललितपुर जिले के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा जून, 1988 में दिए गए आदेश के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।

रिकॉर्ड के मुताबिक मन्नू लाल नामक व्यक्ति ने 20 सितंबर, 1984 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी पक्ष ने नजरबाग कुनवा के बसतगुवा गांव में विवादित 6.45 एकड़ भूमि पर जबरदस्ती फसल काटनी शुरू कर दी।

अभियोजक के मुताबिक, उनके बीच झगड़ा शुरू हो गया जिसमें बात बढ़ने पर आरोपी और शिकायतकर्ता पक्ष के बीच लाठी डंडे चले और इस दौरान दोनों पक्ष के लोग गंभीर रूप से घायल हुए। इसमें आरोपी पक्ष से दो व्यक्तियों- जालिम और भागीरथ की मौत हो गई।

इस घटना के बाद शिकायतकर्ता पक्ष के 15 लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) का मुकदमा दर्ज कराया गया। वर्ष 1988 में सुनवाई अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी करार दिया। हालांकि इन्हें अच्छे आचरण के लिए एक वर्ष के ‘प्रोबेशन’ पर रिहा कर दिया गया।

दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए आरोपी व्यक्तियों ने 1988 में उच्च न्यायालय का रुख किया और इनकी अपील लंबित रहने के दौरान छह व्यक्तियों का निधन हो गया, जबकि जीवित छह अपीलकर्ताओं (चार महिलाएं और दो पुरुष) की अपील लंबित रही।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विवादित भूमि के संबंध में दोनों पक्षों के बीच मुकदमा लंबित था और अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट करने में विफल रहा कि कौन सा पक्ष हमलावर था और किस पक्ष ने विवादित भूमि पर मक्का की बुवाई की थी।

अदालत ने कहा कि जब अभियोजन पक्ष द्वारा यह साबित नहीं किया जाता कि विवादित भूमि या फसल, शिकायतकर्ता पक्ष की थी तो इस मामले में संपत्ति की निजी रक्षा का उनका अधिकार पैदा नहीं होता।

अदालत ने कहा, “इसलिए जब साक्ष्य से यह स्पष्ट नहीं है कि कौन सा पक्ष हमलावर था तो यह माना जाएगा कि यह खुली लड़ाई थी और इसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने कृत्य के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है।”

चार महिलाओं की भूमिका के संबंध में अदालत ने चार सरकारी गवाहों के बयानों में विसंगति पाई और कहा कि मौके पर ये चार महिलाएं मौजूद थी और अभियोजन पक्ष की तरफ से घायल गवाहों ने जिरह के दौरान कहा कि इन महिलाओं ने कोई हथियार नहीं उठाया था और ना ही कोई हमला किया था।

अदालत ने कहा कि इस बात का कोई स्पष्ट सबूत नहीं है कि आरोपी महिला अपीलकर्ताओं ने इस अपराध में प्रतिभाग किया। इसलिए ये संदेह का लाभ पाने की हकदार हैं।

अदालत ने 21 जुलाई को दिए अपने निर्णय में इन महिलाओं की दोषसिद्धि रद्द करते हुए इन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, दो पुरुष आरोपी अपीलकर्ताओं- भजन लाल और रामानंद के संबंध में अदालत ने संघर्ष में इनकी सक्रिय भागीदारी पाई और इनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए इन्हें एक महीने के भीतर सुनवाई अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।

भाषा सं राजेंद्र धीरज

धीरज


लेखक के बारे में