पत्नी की कब्र के दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगाने संबंधी याचिका अदालत ने खारिज की

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पत्नी की कब्र के दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगाने संबंधी याचिका अदालत ने खारिज की

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  • Publish Date - July 12, 2026 / 05:13 PM IST,
    Updated On - July 12, 2026 / 05:13 PM IST

नयी दिल्ली, 12 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने एक व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने अप्रैल 2021 में दफनाई गई अपनी पत्नी की कब्र का दोबारा इस्तेमाल किये जाने पर रोक लगाने का अनुरोध किया था।

अदालत ने कहा कि अगर व्यक्ति का अनुरोध स्वीकार किया गया तो समाज की जरूरतों के लिए इस्तेमाल होने वाली सीमित सार्वजनिक जमीन पर किसी एक व्यक्ति का निजी अधिकार हो जाएगा।

जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत आठ अक्टूबर 2025 के निचली अदालत के आदेश के खिलाफ दायर एम. बशारत हुसैन नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी की कब्र के संरक्षण की मांग की थी। उसकी पत्नी को अप्रैल 2021 में शाहीन बाग कब्रिस्तान में दफनाया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, जब तक शव पूरी तरह से मिट्टी में विलीन नहीं हो जाता, कब्र का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

मामले में प्रतिवादी जमीयत उलेमा-ए-हिंद प्रबंधन कमेटी ने कहा कि कब्रिस्तान में दफनाने के लिए जगह की भारी कमी है, ऐसे में जरूरत पड़ने पर गरिमापूर्ण तरीके से और मान्य धार्मिक परंपराओं के अनुसार कब्र का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

दस जुलाई के अपने आदेश में जिला न्यायाधीश अतुल अहलावत की अदालत ने कहा, ‘निचली अदालत ने लागू कानूनों के अनुसार तथ्यों का सही ढंग से आकलन किया है। इस अदालत को उसके आदेश में कोई मनमानी या कानूनी त्रुटि नहीं दिखती।’

अदालत ने कहा, ‘इसलिए इस (व्यक्ति की) अपील में कोई दम नहीं है और यह खारिज की जाती है। निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा जाता है।’

अपीलकर्ता का कहना था कि सात साल पूरे होने से पहले कब्र को खोदना मृतक की गरिमा और संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधन कमेटी और कब्रिस्तान के देखरेख करने वाले मुफ्ती अब्दुल रज़ीक ने व्यक्ति की इस मांग का विरोध किया। उनका कहना था कि अपीलकर्ता के पास किसी सार्वजनिक कब्रिस्तान में किसी खास कब्र पर अधिकार नहीं है।

अपील खारिज करते हुए जिला न्यायाधीश ने कहा कि इस्लामी कानून में सामान्य तौर पर कब्रों को छेड़ने की अनुमति नहीं है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में यह भी माना गया है कि यदि दफनाने की जगह कम हो, तो अपवाद के तौर पर ऐसा किया जा सकता है।

अदालत ने कहा, ‘अपीलकर्ता ने अपनी पत्नी के शव की गरिमा बनाए रखने के लिए (निचली अदालत के फैसले पर) अस्थायी निषेधाज्ञा लगाने की मांग की थी, लेकिन किसी तय समय के लिए ऐसी रोक नहीं लगाई जा सकती। ऐसा करने से सीमित सार्वजनिक जमीन पर किसी एक व्यक्ति का निजी अधिकार हो जाएगा।’

भाषा जोहेब सुभाष

सुभाष