नयी दिल्ली, 12 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि किसी आपराधिक मामले में सरकारी गवाह बने सह-आरोपी की क्षमादान याचिका का विरोध करने का अधिकार दूसरे आरोपी को नहीं है।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने कहा कि इसके बजाय, सह-आरोपी के पास सुनवाई के दौरान सरकारी गवाह बने सह-आरोपी की गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए उससे जिरह करने का मौका होता है।
अदालत ने चार जुलाई के फैसले में कहा गया, ‘‘दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 306 की व्यवस्था हर सह-आरोपी को अपनी बात रखने का अधिकार नहीं देती है। क्षमादान देना ऐसा काम नहीं है, जिससे सह-आरोपी को कोई नुकसान हो या जिससे सीधे तौर पर उसे दोषी ठहराया जाए।’’
अदालत ने स्पष्ट किया, ‘‘सरकारी गवाह बनने वाले की गवाही को स्वीकार्य सबूत मानने से पहले, सुनवाई के चरण में उससे पूछताछ और फिर जिरह की जाती है। सुनवाई के चरण में सह-आरोपी को सरकारी गवाह बनने वाले से जिरह करने और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का पर्याप्त मौका मिलता है। इसलिए, सह-आरोपी को गवाह बनने वाले व्यक्ति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का एकमात्र प्रभावी मौका सुनवाई के चरण में ही मिल सकता है।’’
अदालत धनशोधन मामले में आरोपी एक कंपनी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। कंपनी 2024 के उस आदेश को वापस लेने की मांग कर रही थी, जिसके तहत एक दूसरे आरोपी को सरकारी गवाह का दर्जा दिया गया था।
याचिकाकर्ता कंपनी का तर्क था कि वह इस मामले में एक ज़रूरी पक्ष थी और यह आदेश उसे अपनी बात रखने का मौका दिए बिना ही दे दिया गया था।
भाषा संतोष सुरेश
सुरेश