‘द सिटी एज ए म्यूजियम’ प्रदर्शनी के तहत दिल्ली की पड़ताल सीखने की जगह के रूप में की जा रही
‘द सिटी एज ए म्यूजियम’ प्रदर्शनी के तहत दिल्ली की पड़ताल सीखने की जगह के रूप में की जा रही
नयी दिल्ली, 18 सितंबर (भाषा) ‘दिल्ली कला दीर्घा’ (डीएजी) के कला और विरासत से जुड़े उत्सव ‘द सिटी एज ए म्यूजियम’ (शहर को एक संग्रहालय के रूप में देखना) का दूसरा संस्करण राजधानी के कला स्कूलों, अकादमियों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों और आसपास के अन्य इलाकों में आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद शहर को सीखने और ज्ञान का सृजन करने वाली जगह के तौर पर देखना है, जो यहां के समुदायों, पहचानों और संस्कृति को आकार दे रहा है।
12 सितंबर को शुरू हुआ यह उत्सव शहर के समृद्ध सांस्कृतिक मानचित्र और इससे जुड़ी जगहों पर प्रदर्शनियों, वार्ताओं, कार्यशालाओं और प्रस्तुतियों आदि के जरिए शहर के इतिहास की विभिन्न परतों को समझने का प्रयास है।
डीएजी के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी आशीष आनंद ने एक बयान में कहा, ‘‘दिल्ली में इस दूसरे संस्करण के साथ हम शहर के सीखने और ज्ञान का सृजन करने के अपने उल्लेखनीय इतिहास की ओर लौट रहे हैं। हम ऐतिहासिक संस्थानों, आधुनिक शिक्षा केंद्रों, पुस्तकालयों, सामुदायिक स्थलों और सड़कों को फिर से खुद देख रहे हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यहां हमारे पहले संस्करण को मिली जबरदस्त प्रतिक्रिया के बाद हमें दिल्ली के लोगों के साथ इस यात्रा को आगे बढ़ाने और हर शहर की तरह यहां यह सवाल उठाते रहने की खुशी है कि वास्तव में सीखना कहां होता है और शहर के पास मौजूद ज्ञान को आकार कौन देता है।
इस संस्करण के प्रमुख आकर्षणों में से एक बीकानेर हाउस में लगाई गई प्रदर्शनी ‘विजन एंड लैंडस्केप: एक्वाटिंट्स ऑफ इंडिया बाय थॉमस डेनियल एंड विलियम डेनियल’ है।
कला दीर्घा के अनुसार, इस प्रदर्शनी में ‘एक्वाटिंट प्रिंट’ (छपाई की एक तकनीक) के 142 दुर्लभ और पूर्ण सेट को प्रदर्शित किया गया है, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘ओरिएंटल सीनरी’ के नाम से जाना जाता है। यह भारतीय वास्तुकला और परिदृश्य को दर्शाने के लिए अंग्रेज कलाकारों द्वारा शुरू की गई सबसे बड़ी परियोजना है।
वर्ष 1786 से 1793 के बीच भारत में की गई अपनी लंबी यात्राओं को दर्शाने वाले थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल के ‘एक्वाटिंट प्रिंट’ दर्शकों को उसी यात्रा से रूबरू कराते हैं, जिसे इन दोनों कलाकारों ने पूरे देश में मिलकर तय किया था।
डीएजी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (एसवीपी) गाइल्स टिलोटसन द्वारा तैयार की गई इस प्रदर्शनी में उस भारत को दिखाया गया है, जिसे दोनों कलाकारों ने देखा था। यह यात्रा कलकत्ता से शुरू होकर गंगा के मैदानी इलाकों से होते हुए दिल्ली तक पहुंचती है, फिर गढ़वाल की पहाड़ियों तक जाती है।
इसके बाद लखनऊ के रास्ते वापस कलकत्ता लौटती है और फिर मद्रास से तमिलनाडु होते हुए आगे बढ़ती है तथा अंत में पश्चिमी भारत के चट्टानों को काटकर बनाए गए मंदिरों को देखने के लिए बंबई पहुंचती है।
‘विजन एंड लैंडस्केप’ को मूल छह खंडों के आधार पर तैयार किया गया है, जिनमें से प्रत्येक में 24 प्रिंट शामिल हैं।
आनंद ने कहा, ‘‘इस तरह का पूरा सेट मिलना बेहद मुश्किल है और दिल्ली में इसे सामूहिक रूप से प्रदर्शित किया जाना केवल दूसरी बार हो रहा है।’’
कला दीर्घा ने ‘कॉलेज ऑफ आर्ट’ के सहयोग से 1950 के दशक से 1990 के दशक तक की कला यात्रा पर आधारित एक प्रदर्शनी भी तैयार की है। ‘मैट्रिक्स एंड मोल्ड’ नामक यह प्रदर्शनी संस्थान में छपाई कला और मूर्तिकला के प्रयोगों को दोबारा सामने लाती है तथा शिक्षकों और विद्यार्थियों की विभिन्न पीढ़ियों के बीच संवाद को दर्शाती है।
इस प्रदर्शनी में जगमोहन चोपड़ा, मंजीत बावा, शोभा ब्रूटा, गोगी सरोज पाल, कंचन चंदर, अनुपम सूद, सोमनाथ होरे, बिमान बिहारी दास, बी.सी. सान्याल और शुक्ला सावंत जैसे कलाकारों की कृतियां शामिल हैं।
आनंद मोय बनर्जी और शुक्ला सावंत द्वारा 15 सितंबर को आयोजित वार्ता और पैनल चर्चा में कॉलेज ऑफ आर्ट के 1970 और 1980 के दशक के दौर पर चर्चा की गई। उस समय प्रिंटमेकिंग विभाग के प्रतिष्ठित प्रोफेसरों के नेतृत्व में प्रयोगात्मक शिक्षण और कठोर स्टूडियो अभ्यास ने कलाकारों की एक नई पीढ़ी को तैयार किया, जब एनालॉग दुनिया डिजिटल युग की तरफ बढ़ रही थी।
कॉलेज के प्रिंटमेकिंग विभाग ने कलाकार संतोष जैन की देखरेख में ‘कोलाग्राफ प्रिंटमेकिंग’ कार्यशाला का आयोजन किया, जिसमें प्रिंट तैयार करने संबंधी प्रक्रिया को समझाया गया।
बृहस्पतिवार को बाबा बघेल सिंह संग्रहालय में एक ‘वॉकथ्रू’ के दौरान, कलाकार अर्पणा कौर और इतिहासकार कनिका सिंह ने इस बात पर चर्चा की कि कैसे सिख विरासत संबंधी संग्रहालय शहर और देश की यादों में समुदाय की मौजूदगी को दिखाते हैं; इसके बाद उन्होंने अर्पणा कौर की ‘अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर’ का दौरा किया।
शुक्रवार को सामाजिक कार्यकर्ता रचित और डीएजी संग्रहालय की टीम ने जामिया नगर इलाके में एक ‘सेंसरी एक्सप्लोरेशन’ (इंद्रियों के जरिये अनुभव) का नेतृत्व किया। इसमें कविता के जरिए इलाके के शुरुआती इतिहास और ‘आज के शहरी नियोजन की राजनीति से पैदा हुई दरारों’ को समझने की कोशिश की गई।
कल यानी 19 सितंबर को ‘अर्बन स्टडीज’ विषय की शोधार्थी गजाला जमील, संपादक जमाल किदवई और शोधार्थी अनाब नायर जामिया मिलिया इस्लामिया और उसके आस-पास के इलाके के इतिहास को अलग-अलग नज़रियों से समझेंगे।
इसमें कविता के जरिए दुख जाहिर करने की कला, छात्र आंदोलनों की यादें और देश के लिए कला और शिल्प पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने वाली एक पत्रिका जैसे विषय शामिल होंगे।
इतिहासकार सुदेशना गुहा और अमर फारूकी 20 सितंबर को एक क्षेत्रीय भ्रमण के दौरान फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल में स्थापित 14वीं सदी के हौज खास मदरसा के इतिहास और पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन करेंगे। इस दौरान वे यह भी समझेंगे कि शैक्षणिक स्थल किस तरह शहरी छवियों और पहचान के साथ जुड़े होते हैं।
यह उत्सव 25 सितंबर को निजामुद्दीन स्थित गालिब अकादमी में समाप्त होगा। समापन कार्यक्रम में कला लेखिका कामायनी शर्मा भारत और पाकिस्तान के आधुनिकतावादी कलाकारों के एक संग्रह पर चर्चा करेंगी।
भाषा संतोष मनीषा
मनीषा

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