दिल्ली की अदालत ने समय से पहले जन्मे और कमजोर शिशु को छोड़ने के मामले में माता-पिता को दोषी ठहराया

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दिल्ली की अदालत ने समय से पहले जन्मे और कमजोर शिशु को छोड़ने के मामले में माता-पिता को दोषी ठहराया

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  • Publish Date - September 13, 2026 / 02:25 PM IST,
    Updated On - September 13, 2026 / 02:25 PM IST

नयी दिल्ली, 13 सितंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने एक दंपति को उनके समय से पहले जन्मे और चिकित्सकीय रूप से कमजोर शिशु को अस्पताल में छोड़ने के मामले में दोषी ठहराया और कहा कि यदि किसी शिशु को चिकित्सा संस्थान में छोड़ने के पीछे उसे पूरी तरह त्यागने की मंशा हो, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 317 के तहत परित्याग माना जा सकता है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुनील कुमार ने हरीना रे उर्फ रीना और उनके पति जीतू कुमार को भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 317 (12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को उसके माता पिता या उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति द्वारा उजागर करना और छोड़ देना) तथा धारा 34 के तहत दोषी ठहराया।

दस सितंबर के आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘साबित तथ्यों पर समग्र रूप से विचार करने पर यह स्थापित होता है कि बच्चे को छोड़ने के कृत्य के साथ-साथ उसे पूरी तरह से त्यागने का इरादा भी शामिल था, जो भादंसं की धारा 317 का एक अनिवार्य तत्व है।’’

अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि बच्ची का जन्म 12 दिसंबर 2014 को दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में समय से पहले हुआ था। कम वजन और चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण उसे नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) में भर्ती कराया गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, माता-पिता अस्पताल छोड़कर चले गए और शिशु की देखभाल के लिए वापस नहीं लौटे, जबकि उनसे संपर्क करने के बार-बार प्रयास किए गए। इसके बाद 12 मार्च 2015 को बच्ची को देखभाल के लिए निर्मल छाया भेज दिया गया, जहां कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई।

अदालत ने अन्य साक्ष्यों के साथ डीएनए रिपोर्ट पर भी भरोसा किया, जिससे यह साबित हुआ कि रीना और जीतू कुमार बच्ची के जैविक माता-पिता थे।

अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि शिशु को एक विशेष चिकित्सा सुविधा में छोड़ना उसे त्यागने के बजाय इलाज दिलाने की मंशा को दर्शाता है।

अदालत ने कहा, ‘‘इस अपराध का सार बच्चे को पूरी तरह त्यागने की मंशा से उसे छोड़ना या असहाय स्थिति में डालना है।’’

अदालत ने कहा कि बच्ची चिकित्सकीय रूप से कमजोर थी और आरोपी उसके माता-पिता होने के नाते उसकी देखभाल करने के लिए बाध्य थे। बच्ची को एनआईसीयू से छुट्टी मिलने के बाद भी उन्होंने उसकी देखभाल दोबारा शुरू नहीं की और उनसे संपर्क करने के बार-बार किए गए प्रयासों के बावजूद वे सामने नहीं आए। इससे बच्ची को पूरी तरह त्यागने की उनकी मंशा स्पष्ट होती है।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है और दोनों आरोपियों को भादंसं की धारा 317/34 के तहत दोषी ठहराया।

भाषा शोभना गोला

गोला