दिल्ली : अनधिकृत कॉलोनियों की संपत्ति को वैध बनाने के रास्ते में शुल्क बना रोड़ा

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दिल्ली : अनधिकृत कॉलोनियों की संपत्ति को वैध बनाने के रास्ते में शुल्क बना रोड़ा

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  • Publish Date - July 8, 2026 / 04:04 PM IST,
    Updated On - July 8, 2026 / 04:04 PM IST

नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने महानगर की अनधिकृत कॉलोनियों की संपत्ति को विनियमित करने के लिए अभियान चलाया है, लेकिन दो महीने बीतने के बावजूद महज पांच आवेदन आए हैं और इस अभियान की सफलता में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरा है विनियमितीकरण शुल्क।

अधिकारियों का कहना है कि कम आय वाले कई निवासी अपने घरों को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए लाखों रुपये का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया में देरी करने पर कोई विशेष दुष्प्रभाव नहीं होना भी एक कारण हो सकता है।

एमसीडी ने 24 अप्रैल को ‘स्वागम’ पोर्टल की शुरुआत उन निवासियों को अपनी मौजूदा प्रॉपर्टी को ‘‘जैसी है, वैसी है’’ के आधार पर विनियमित करने की सुविधा देने के लिए की थी। इसका लाभ वे संपत्ति मालिक उठा सकते हैं जिन्हें केंद्र की ‘प्रधानमंत्री अनऑथराइज़्ड कॉलोनीज़ इन दिल्ली आवास अधिकार योजना’ (पीएम-उदय ) के तहत पहले ही मालिकाना हक मिल चुका है।

शहर में इस समय 40 हजार से अधिक लोग पीएम-उदय का लाभ उठाने के पात्र हैं।

हालांकि, एमसीडी को अब तक केवल पांच आवेदन ही मिले हैं। अधिकारियों ने बताया कि नगर निकाय की ओर से आवेदकों से स्पष्टीकरण या अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने के बाद ये सभी आवेदन अब भी लंबित हैं।

एमसीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘नजफगढ़ से आए एक आवेदन में, आवेदक ने दस्तावेज पर कलम से अपना नाम ‘किशन’ से बदलकर ‘कृष्ण’ कर दिया था। हमने उससे मूल दस्तावेज जमा करने को कहा, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।’’

अधिकारियों का हालांकि कहना था कि शिथिल प्रतिक्रिया की मुख्य वजह अधूरे आवेदन नहीं हैं। उनके मुताबिक विनियमितीकरण के लिए भारी शुल्क चुकाने की कोई तत्काल ज़रूरत नहीं है, इसलिए निवासियों को इसमें कोई विशेष लाभ नहीं दिखाई दे रहा है।

एक अधिकारी ने बताया, ‘‘उदाहरण के लिए, 100 वर्ग मीटर के भूखंड के लिए विनियमितीकरण का कुल खर्च लगभग तीन से चार लाख रुपये आता है। इन कॉलोनियों में रहने वाले 80 प्रतिशत से अधिक लोग कामकाजी वर्ग के हैं। अगर उनकी मासिक आय कम है, तो वे एक बार में इतना खर्च कैसे उठा सकते हैं? और जब कोई नतीजा ही नहीं भुगतना है, तो वे इसकी परवाह क्यों करेंगे?’’

अधिकारियों ने बताया कि एमसीडी ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और दिल्ली सरकार के समक्ष यह मुद्दा उठाया है और विनियमितीकरण शुल्म में कमी करने की संभावना पर बातचीत चल रही है।

उन्होंने बताया कि खराब प्रतिक्रिया का एक और कारण संपत्तियों का नियमितीकरण कराने के लिए किसी समय-सीमा का न होना है।

एक अधिकारी ने कहा, ‘‘चाहे कोई दो महीने बाद आवेदन करे या चार महीने बाद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। वास्तव में, तुरंत आवेदन करने के लिए कोई प्रोत्साहन भी नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि लोग अपनी संपत्तियों पर कब्ज़ा बनाए रख सकते हैं, और ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत सिर्फ इसलिए तोड़-फोड़ या कोई तुरंत कार्रवाई की जाएगी कि उन्होंने आवेदन नहीं किया है।

विनियमितीकरण की लागत ‘दिल्ली एकीकृत भवन निर्माण उप विधि (यूबीबीएल) 2016 के तहत तय की जाती है और इसमें कई तरह के शुल्क शामिल होते हैं।

इनमें, आवेदकों को भवन निर्माण योजना जमा करते समय निर्माण क्षेत्र के प्रति वर्ग मीटर 10 रुपये का बिल्डिंग परमिट शुल्क देना होता है। उन्हें ‘सरल’ योजना स्कीम के तहत भी शुल्क देना होगा, जो कॉलोनी की श्रेणी के हिसाब से अलग-अलग होगा। उदाहरण के लिए, पॉश श्रेणी ए और बी कॉलोनियों में भूखंड के लिए 5,000 रुपये, सी और डी श्रेणियों में 2,500 रुपये, और कम आय वाली श्रेणी ई, एफ,जी और एच कॉलोनियों में 1,500 रुपये का शुल्क देना होता है।

इनके अलावा, आवेदकों को अतिरिक्त तल क्षेत्र अनुपात (एफएआर) पर 450 रुपये प्रति वर्ग मीटर का लेवी शुल्क देना होगा (जहां भी यह लागू हो)। साथ ही, निर्माण पूर्ण और निवास प्रमाण पत्र लिए बिना इमारत में रहने पर 25,000 रुपये का ‘प्री-ऑक्यूपेंसी’ शुल्क भी देना होगा।

अधिकारियों ने कहा कि इन मदों की वजह से घर को विनियमित कराने का खर्च काफ़ी बढ़ जाता है, जिससे अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले कई परिवारों के लिए यह प्रक्रिया महंगी हो जाती है।

योजना के प्रति शिथिल प्रतिक्रिया की एक और वजह इन कॉलोनियों में मालिकाना हक की स्थिति है।

अधिकारियों ने बताया कि बड़ी संख्या में निवासी किराएदार के तौर पर रहते हैं, जबकि असली मालिक अक्सर उसी इमारत या आस-पास ही रहते हैं और वे विनियमितीकरण की प्रक्रिया से गुज़रने को तैयार नहीं हैं।

नगर निकाय का कहना था कि शुरुआती लागत के बावजूद, विनियमितीकरण से कई दीर्घकालिक लाभ मिलते हैं।

एमसीडी ने बताया कि एक बार जब किसी संपत्ति को विनियमित कर दिया जाता है, तो उसका कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त मालिक मिल जाता है, जिससे अनधिकृत कॉलोनियों में आम तौर पर होने वाले मालिकाना हक के विवाद कम हो जाते हैं। इससे मालिकों को गृह ऋण लेने में भी मदद मिलती है, क्योंकि बैंक आम तौर पर अनधिकृत संपत्तियों के लिए ऋण नहीं देता और साथ ही एक संपत्ति हस्तांतरण विलेख पत्र के जरिए कानूनी बिक्री या स्थानांतरण भी आसान हो जाता है।

दिल्ली सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों के निवासियों के लिए पीएम-उदय योजना के तहत मालिकाना हक पाने के लिए जरूरी संपत्ति हस्तांतरण विलेख और अधिकृत पत्र के लिए आवेदन करने की आखिरी तारीख 31 अक्टूबर तय की है।

भाषा धीरज नरेश

नरेश