नयी दिल्ली, 21 सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के पीछे कथित ‘‘व्यापक साजिश’’ से जुड़े यूएपीए मामले में सोमवार को कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई 30 सितंबर के लिए सूचीबद्ध कर दी।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की पीठ ने दिल्ली पुलिस के वकील द्वारा स्थगन का अनुरोध किए जाने के बाद सुनवाई टाल दी।
विशेष लोक अभियोजक मधुकर पांडे ने कहा कि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू स्वास्थ्य कारणों से उपस्थित नहीं हो सके हैं। पीठ ने कहा, ‘‘मामले की सुनवाई 30 सितंबर के लिए स्थगित की जाती है।’’
खालिद और इमाम के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज है। उन पर फरवरी 2020 के दंगों के कथित मुख्य षड्यंत्रकारियों में शामिल होने का आरोप है। दंगों में 53 लोगों की जान चली गई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए), 2019 और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान यह हिंसा भड़की थी।
कार्यकर्ता खालिद सैफी और आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत कई अन्य लोगों पर भी कथित व्यापक साजिश में शामिल होने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। इस मामले की जांच दिल्ली पुलिस का विशेष प्रकोष्ठ कर रहा है।
अदालत ने सोमवार को ताहिर हुसैन की जमानत याचिका पर सुनवाई भी टाल दी और इसे नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया।
चार जुलाई को निचली अदालत द्वारा जमानत याचिकाएं तीसरी बार खारिज किये जाने के बाद खालिद और इमाम ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।
इमाम को इस मामले में 25 अगस्त 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जबकि खालिद को 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था।
दिल्ली पुलिस ने उच्च न्यायालय में दोनों की जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए उन्हें दंगों का ‘‘मुख्य षड्यंत्रकारी’’ बताया है। पुलिस ने कहा है कि दोनों मामले में अन्य सह-आरोपियों के समानता के आधार पर जमानत का दावा नहीं कर सकते।
पुलिस ने यह भी कहा है कि मौजूदा जमानत याचिकाएं उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश के विपरीत हैं। उस आदेश में कहा गया था कि उन्हें संरक्षित गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद या एक वर्ष पूरा होने पर, जो भी पहले हो, ही रिहाई की मांग करनी चाहिए।
चार जुलाई को निचली अदालत ने खालिद की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उसके पास उच्चतम न्यायालय के पांच जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा ‘‘कोई विकल्प नहीं’’ है और इसलिए वह याचिका पर ना तो विचार कर सकती है और ना ही उन्हें राहत दे सकती है।
उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने दो सितंबर 2025 को खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
उच्चतम न्यायालय ने पांच जनवरी को इस फैसले को बरकरार रखा, लेकिन सह-आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दे दी।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने उस वक्त कहा था कि खालिद और इमाम के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है।
शीर्ष अदालत ने 22 मई को सह-आरोपी अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद को छह महीने की अंतरिम जमानत दी थी।
भाषा अमित सुभाष
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