मन:प्रभावी दवाओं की जब्ती मामले में दवा कंपनी के अधिकारी को ज़मानत

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मन:प्रभावी दवाओं की जब्ती मामले में दवा कंपनी के अधिकारी को ज़मानत

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  • Publish Date - September 21, 2026 / 07:09 PM IST,
    Updated On - September 21, 2026 / 07:09 PM IST

नयी दिल्ली, 21 सितंबर (भाषा) नोएडा में कथित तौर पर 473 किलोग्राम मन:प्रभावी दवाओं की बरामदगी से जुड़े मामले में गिरफ्तार किए गए एक दवा कंपनी के अधिकारी को दिल्ली की एक अदालत ने यह कहते हुए जमानत दे दी कि परिसर पर उसका कब्जा या नियंत्रण अथवा प्रतिबंधित सामग्री की खरीद में उसकी सीधी संलिप्तता दर्शाने वाली कोई सामग्री मौजूद नहीं है।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी नोएडा स्थित एक गोदाम से मादक पदार्थों की बरामदगी के संबंध में ज्योति नगर थाने में दर्ज स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के मामले में आरोपी अमन शर्मा की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे।

अदालत ने 19 सितंबर के अपने आदेश में कहा, ‘अदालत का मानना है कि आवेदक के मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत लागू होने वाली रोक यहां प्रभावी नहीं होगी। जहां तक इस दूसरी शर्त का सवाल है कि आरोपी जमानत पर आकर दोबारा ऐसा अपराध कर सकता है, तो चूंकि उसका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, इसलिए अदालत यह मान सकती है कि भविष्य में वह इस तरह के किसी जुर्म में शामिल नहीं होगा।’

अदालत ने इस बात का संज्ञान लिया कि जांच एजेंसी की कार्रवाई में शर्मा का नाम पहली बार केवल 23 जुलाई 2026 को आया, जब वह कथित तौर पर नोएडा में सह-आरोपी शिव नारायण झा के साथ पाया गया था। इसके बाद दोनों को एक गोदाम में ले जाया गया, जहां से दवाएं बरामद की गईं।

अभियोजन पक्ष का दावा है कि तलाशी के दौरान ट्रामाडोल युक्त प्रॉक्सिओम-स्पास कैप्सूल के 46.77 किलोग्राम, अल्प्राजोलम युक्त अल्फा-0.25 गोलियों के 151.6 किलोग्राम, अल्फा-0.50 गोलियों के 2.04 किलोग्राम, ट्रामाडोल युक्त ट्रॉमासेट गोलियों के 55.18 किलोग्राम और ट्रामाडोल युक्त ट्रॉमा-50 कैप्सूल के 217.74 किलोग्राम बरामद किए गए थे।

जमानत याचिका का विरोध करते हुए अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया था कि बरामद मात्रा वाणिज्यिक स्तर की थी और एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत जमानत पर रोक लागू होती है।

हालांकि, अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि शर्मा को इस मामले में केवल सह-आरोपी झा और गोदाम के मालिक के बयान के आधार पर आरोपी बनाया गया था।

गोदाम के मालिक ने कहा था कि शर्मा और झा दो-तीन बार उस गोदाम में आए थे।

अदालत ने यह भी गौर किया कि उस परिसर की चाबियाँ झा के पास थीं, और ऐसा कोई किरायानामा या अन्य रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि गोदाम पर शर्मा का कब्जा था। अदालत को ऐसा कोई भी आपत्तिजनक चैट, इलेक्ट्रॉनिक संचार या कॉल रिकॉर्ड भी नहीं मिला, जो उसे अन्य आरोपी से जोड़ता हो।

अदालत ने कहा, ‘आवेदक के नाम पर कोई व्यावसायिक रिकॉर्ड नहीं है, जैसे कि आवेदक के नाम पर इनवॉइस, रसीदें, भुगतान आदि, जिससे यह पता चलता हो कि आवेदक ने किसी अन्य व्यक्ति या स्रोत से बरामद प्रतिबंधित सामान खरीदा या प्राप्त किया था।’

एक दवा कंपनी में क्षेत्रीय प्रबंधक के तौर पर काम करने वाले शर्मा ने कथित अपराध में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया था और दावा किया था कि वह प्रतिबंधित सामान के बारे में जाने बिना ही झा के साथ गये थे।

अदालत ने माना कि इस मामले में एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37 के तहत रोक लागू नहीं होगी और उसने पहले से किसी अन्य अपराध में शामिल न होने के उनके रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया। अदालत ने उन्हें 20,000 रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि का जमानतदार पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया।

भाषा सुमित दिलीप

दिलीप