जयपुर में कोयले की मांग बढ़ी, ढाबों को गैस सिलेंडर नहीं मिल रहे

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जयपुर में कोयले की मांग बढ़ी, ढाबों को गैस सिलेंडर नहीं मिल रहे

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  • Publish Date - March 14, 2026 / 07:47 PM IST,
    Updated On - March 14, 2026 / 07:47 PM IST

जयपुर, 14 मार्च (भाषा) वाणिज्यिक रसोई गैस सिलेंडरों की कमी के चलते जयपुर में कोयले की मांग बढ़ गयी है। शहर में कई ढाबे और छोटे भोजनालय खाना बनाने के लिए अब कोयले से जलने वाली पारंपरिक ‘भट्टियों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं।

कोयले की मांग में यह बढ़ोतरी खासकर जयपुर के चारदीवारी या परकोटे वाली तंग गलियों में साफ दिखाई देती है। यहां कई पारंपरिक ढाबों और और छोटे रेस्तरां में खुली रसोई है जहां अब भी कोयले की भट्टियों पर खाना बनाया जा सकता है।

कोयला कारोबारियों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में मांग बढ़ी है क्योंकि रेस्तरां एवं ढाबों को वाणिज्यिक रसोई गैस सिलेंडर लेने में काफी मुश्किल हो रही है।

शहर के कोयला कारोबारी दीपक खंडेलवाल ने बताया कि वाणिज्यिक एलपीजी गैस सिलेंडरों की कमी के कारण पिछले तीन-चार दिनों में मांग में काफी बढ़ोतरी हुई है।

उन्होंने कहा, ‘‘वाणिज्यिक सिलेंडरों की कमी के चलते पिछले तीन-चार दिनों में कोयले की मांग निश्चित रूप से बढ़ी है। इस समय चारदीवारी वाले शहर के ढाबे और रेस्तरां ही मुख्य खरीदार हैं।’

खंडेलवाल ने बताया कि बाजार में कोयला अब भी उपलब्ध है लेकिन मांग में अचानक बढ़ोतरी के कारण इसकी कीमतों में थोड़ा इजाफा हुआ है।

उन्होंने कहा, ‘पहले तो ढाबे वाले बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल करते थे लेकिन धीरे-धीरे उनमें से ज़्यादातर एलपीजी पर निर्भर हो गए। वैसे तो कोयला पारंपरिक और अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन है लेकिन धुएं एवं राख की समस्या के कारण कई भोजनालयों/ ढाबों ने गैस का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। अब सिलेंडरों की कमी के चलते वे फिर से इस पारंपरिक ईंधन की ओर लौट रहे हैं।’’

अन्य व्यापारी शिव कुमार ने बताया कि हाल के दिनों में कोयले की मांग कई गुना बढ़ गई है। उन्होंने कहा, ‘कोयले की मांग में पांच से छह गुना बढ़ोतरी हुई है। यह सस्ता तो है लेकिन सभी होटल इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी रसोई का ढांचा कोयले पर खाना बनाने के लिए उपयुक्त नहीं है।’

कुमार ने बताया कि फिलहाल मोटे तौर पर छोटे ढाबे और भोजनालय ही कोयले या लकड़ी से जलने वाली ‘भट्टियों’ का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी रसोई खुली या आधी-खुली है। यह व्यवस्था भी एलपीजी की आपूर्ति सुचारू होने तक ही है।

शहर में सड़क किनारे बने कई ढाबों में कोयले और लकड़ी दोनों का ही इस्तेमाल किया जाता है। व्यापारियों ने बताया कि कोयले के साथ-साथ लकड़ी की मांग में भी बढ़ोतरी हुई है।

रामगंज इलाके में छोटा होटल चलाने वाले मोहम्मद आसिफ ने बताया कि रेस्तरां मालिकों के पास अब ज़्यादा विकल्प नहीं हैं क्योंकि वाणिज्यिक गैस सिलेंडर आसानी से नहीं मिल रहे।

उन्होंने कहा,‘‘वाणिज्यिक गैस सिलेंडर नहीं मिल रहे हैं। हमें मजबूरन लकड़ी पर खाना बनाना पड़ रहा है। लेकिन लकड़ी और कोयले से निकलने वाले धुएं और राख से दिक्कतें होती हैं।’’

जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन एवं ऐसी दूसरी जगह के कई ढाबे वालों ने बताया कि उन्हें मजबूरन कोयले से जलने वाली ‘‘भट्टियों’’ पर खाना बनाना पड़ रहा है।

कुछ ढाबे वालों ने दिक्कतों के कारण अपना ‘मेन्यू’ छोटा कर दिया है।

इस बीच, ईंधन की कमी का असर शहर के सीएनजी स्टेशनों पर भी देखने को मिल रहा है जहां गैस भरवाने के लिए ऑटो-रिक्शा की लंबी कतारें लगी दिखीं। कई ऑटो वालों ने बताया कि उन्हें गैस भरवाने के लिए पंपों पर घंटों इंतज़ार करना पड़ रहा है, फलस्वरूप उनकी दैनिक आय भी प्रभावित हो रही है।

भाषा पृथ्वी राजकुमार

राजकुमार