नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को विभिन्न दलों के सदस्यों ने न्यायिक सुधारों को समय की मांग बताते हुए जोर दिया कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और न्यायपालिका में वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए।
दो बार के स्थगन के बाद दोपहर दो बजे राज्यसभा की बैठक शुरू होने पर कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को चर्चा एवं लौटाने के लिए पेश किया।
लोकसभा इस विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है।
विधेयक पर चर्चा के बाद कानून मंत्री मेघवाल ने उसका जवाब दिया। मंत्री के जवाब के बाद राज्यसभा ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से लौटा दिया।
चर्चा में हिस्सा ले रहे सदस्यों ने निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या और न्यायपालिका में वंचित वर्ग का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग की।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि देश में जिस तरह से अपराध बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए अदालतों की हालत में सुधार किया जाना चाहिए, अवसंरचना को अत्याधुनिक बनाया जाना चाहिए और न्यायाधीशों की संख्या भी बढ़नी चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में पांच करोड़, उच्च न्यायालयों में 60 से 65 लाख और उच्चतम न्यायालय में 96 हजार मामले लंबित हैं। ‘‘हमें सोचना होगा कि इन मामलों को देखते हुए क्या देश में अदालतों की संख्या और न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त है ?’’
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ती आबादी को ध्यान में रखते हुए बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने जानना चाहा कि कितने न्यायाधीश दलित या पिछड़े वर्ग के समुदाय के हैं।
राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए अखिल भारतीय न्यायिक प्रणाली होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी न्यायाधीशों की नियुक्ति किसी परीक्षा के आधार पर नहीं बल्कि कॉलेजियम व्यवस्था से होती है।
यादव ने कहा ‘‘इस व्यवस्था को खत्म किया जाए और एक अखिल भारतीय न्यायिक प्रणाली बनाई जाए ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से की जा सके। न्यायपालिका में आरक्षण व्यवस्था होनी चाहिए।’’
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज के सबसे पिछड़े और वंचित वर्ग की भागीदारी न्यायपालिका में एक फीसदी भी नहीं है जो बहुत चिंता की बात है।
उन्होंने मांग की कि अगर किसी न्यायाधीश ने किसी मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया है तो उसका कारण सार्वजनिक होना चाहिए।
कांग्रेस के विवेक तन्खा ने कहा कि सरकार ने यह विधेयक लाने में जल्दबाजी की। उन्होंने जानना चाहा कि क्या उच्चतम न्यायालय को पूरा सम्मान दिया जाता है और क्या न्यायालय द्वारा दिए गए सभी आदेशों का पालन किया गया है?
भाजपा की संगीता यादव ने कहा कि अदालतों में लंबित मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना बेहतर कदम है ताकि जल्दी सुनवाई हो सके। उन्होंने कहा कि कई मामले तो दस साल से अधिक समय से लंबित हैं।
उन्होंने कहा कि न्याय समय पर न मिले तो वह निर्रथक हो जाता है। ‘‘इस विधेयक के कानून बनने पर न्याय समय पर मिलना सुनिश्चित होगा।’’
तृणमूल कांग्रेस की मेनका गोस्वामी ने कहा कि एक बड़ी समस्या यह है कि न्यायपालिका में महिलाओं की नियुक्ति नहीं होती। उन्होंने कहा कि सभी उच्च न्यायालय में 30 फीसदी रिक्तियां हैं और महिला न्यायाधीशों की संख्या केवल 14 फीसदी है।
द्रमुक के आर गिरिराजन ने कहा कि न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं की उपेक्षा करना ठीक नहीं है।
बीजू जनता दल के सस्मित पात्रा ने चार न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर भारत के प्रधान न्यायाधीश को और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को बधाई दी।
वाईएसआर कांग्रेस के एस निरंजन रेड्डी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या नहीं बढ़ती बल्कि मामलों की संख्या बढ़ती जाती है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के राजेंद्र हीरालाल जैन ने कहा कि आम आदमी के लिए अदालत अंतिम विकल्प होता है और न्याय विलंब से मिलने पर उसके लिए कोई मायने नहीं रखता।
उन्होंने कहा कि यह विधेयक उन करोड़ों नागरिकों को राहत देगा जो न्याय की बाट जोह रहे हैं। ‘‘कई नागरिकों का पूरा जीवन अदालतों के चक्कर लगाते हुए बीत जाता है लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल पाता।’’
अन्नाद्रमुक के आई एस इन्बादुरै ने कहा कि अगर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ती है तो मामलों की सुनवाई भी जल्दी और आसानी से होगी। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पीठों के गठन की व्यवस्था सराहनीय है।
बीआरएस के रविचंद्र वद्दिराजू ने विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि न्यायिक सुधार समय की मांग हैं।
माकपा के वी शिवदासन ने कहा कि पूर्वाग्रहों से मामले दर्ज करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जानी चाहिए क्योंकि पुराने मामलों का निपटारा नहीं हो पाता और नए मामले दर्ज हो जाते हैं। ‘‘उम्मीद है कि इस समस्या के समाधान में यह विधेयक उपयोगी होगा।’’
नेशनल कॉन्फ्रेंस के चौधरी मोहम्मद रमजान ने कहा कि निचली अदालतों में भी न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए ताकि मामलों की सुनवाई समय पर हो सके।
बहुजन समाजवादी पार्टी के रामजी ने कहा कि न्यायाधीशों की संख्या लंबित मामलों को ध्यान में रख कर बढ़ायी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हर दिन नए मामले दर्ज हो रहे हैं और पुराने मामले लंबे समय से लंबित हैं।
उन्होंने सवाल किया कि सामाजिक न्याय की मूल भावना उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में नजर क्यों नहीं आती?
झामुमो की महुआ माझी ने कहा कि यह कैसे सुनिश्चित होगा कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से न्याय मिल जाएगा? ‘‘इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है।’’
चर्चा में शिवसेना के मिलिंद मुरली देवरा, ज्योति नागनाथ वाघमारे, भाजपा के नरेश बंसल, अशोक कुमार मित्तल, केसरीदेव सिंह झाला, भीम सिंह, अजित माधवराव गोपछड़े, मनन कुमार मिश्र, तृणमूल कांग्रेस के राजीव कुमार, डीएमडीके सदस्य एल के सुधीश, भाकपा के संदोष कुमार पी, द्रमुक सदस्य पी विल्सन, यूपीपी (एल) के प्रमोद बोरो, तेदेपा के विजय चिंताकाल्या, आईयूएमएल के हारिस बीरन और मनोनीत सदस्य उज्ज्वल देवराज निकम ने भी हिस्सा लिया।
विधेयक पर चर्चा जब शुरू हुई तब कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के सदस्य राम मंदिर चढ़ावा चोरी और दिल्ली में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर नारेबाजी कर रहे थे।
उपसभापति हरिवंश ने हंगामा कर रहे सदस्यों से अपनी सीटों पर बैठने का आग्रह करते हुए उनसे विधेयक पर चर्चा में भाग लेने को कहा, लेकिन हंगामा नहीं थमा।
हंगामे के बीच ही उपसभापति ने विधेयक पर चर्चा शुरू करवाई जिसमें विभिन्न दलों के सदस्यों ने भाग लिया। चर्चा के दौरान कांग्रेस सहित विपक्ष के विभिन्न दलों के सदस्यों ने सदन से बहिर्गमन किया। बाद में तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, माकपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा आदि दलों के सदस्य सदन में वापस आ गए और उन्होंने चर्चा में भाग भी लिया।
भाषा मनीषा अविनाश
अविनाश