क्या आयोग ने शिवसेना के दोनों गुटों को चुनाव चिह्न न देने की संभावना पर विचार किया था: न्यायालय

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क्या आयोग ने शिवसेना के दोनों गुटों को चुनाव चिह्न न देने की संभावना पर विचार किया था: न्यायालय

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  • Publish Date - September 17, 2026 / 08:22 PM IST,
    Updated On - September 17, 2026 / 08:22 PM IST

नयी दिल्ली, 17 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को पूछा कि क्या निर्वाचन आयोग ने शिवसेना के एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दोनों गुटों को पार्टी का आरक्षित ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न न देने और उनसे अलग-अलग चिह्न पर चुनाव लड़ने के लिए कहने की संभावना पर ठीक से विचार किया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई फिर से शुरू की, जिनमें शिंदे गुट को असली शिवसेना मानने और उसे ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न आवंटित करने के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती दी गई है।

शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग की ओर से अपनाया गया विधायी बहुमत परीक्षण कानूनी रूप से वैध था और विवाद की परिस्थितियों के हिसाब से उचित था।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जब यह तय किया जा रहा था कि शिवसेना पार्टी और उसका चुनाव चिह्न किसका है, उस समय शिंदे गुट के विधायकों के खिलाफ पद से अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी और यह कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे “नजरअंदाज” किया जा सके।

उन्होंने कौल से कहा, “हालांकि, जैसा कि आपने सही कहा, (अयोग्यता की कार्यवाही पर फैसले का) नतीजा अब मायने नहीं रखता। लेकिन इस बात पर भी घोषणा की जा सकती है कि (निर्वाचन आयोग का) फैसला सही था या नहीं। घोषणा के रूप में राहत मांगी जा सकती है।”

न्यायमूर्ति बागची ने बुधवार को सवाल किया था कि क्या विधायी बहुमत को किसी राजनीतिक दल पर अधिकार तय करने के लिए “सुरक्षित परीक्षण” माना जा सकता है, खासकर तब जब उस बहुमत का गठन करने वाले विधायकों के खिलाफ ही पद से अयोग्यता की कार्यवाही लंबित हो।

कौल ने कहा कि 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाले शिवसेना के 55 विधायकों के पक्ष में पड़े कुल वोट में से 76 फीसदी शिंदे गुट के 40 विधायकों को हासिल हुए थे। उन्होंने कहा कि इसके उलट, उद्धव का समर्थन करने वाले 15 विजयी विधायकों को 23.5 प्रतिशत मत मिले थे।

कौल ने 2019 के विधानसभा चुनावों में शिवसेना उम्मीदवारों (जिनमें हारने वाले प्रत्याशी भी शामिल हैं) को प्राप्त कुल वोट का जिक्र करते हुए कहा कि प्रतिवादियों का समर्थन करने वाले 40 विधायकों को पार्टी के पक्ष में पड़े कुल वोट का लगभग 40 प्रतिशत हासिल हुआ था, जबकि याचिकाकर्ताओं का समर्थन करने वाले 15 विधायकों को 12 फीसदी मत मिले थे।

उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का भी हवाला दिया।

कौल ने कहा कि लोकसभा चुनाव में निर्वाचित पार्टी के 18 सांसदों के पक्ष में पड़े कुल वोट का 73 प्रतिशत शिंदे का समर्थन करने वाले 13 सांसदों को हासिल हुआ था, जबकि उद्धव का समर्थन करने वाले सांसदों को 27 प्रतिशत वोट मिले थे।

उन्होंने कहा कि विधायकों के खिलाफ पद से अयोग्यता की लंबित कार्यवाही अकेले ही निर्वाचन आयोग को ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश’ के पैराग्राफ 15 के तहत विवाद का निपटारा करने से नहीं रोक सकती।

कौल ने कहा कि शिंदे गुट के विधायकों के खिलाफ पद से अयोग्यता की कार्यवाही को खारिज कर दिया गया था, जबकि शीर्ष अदालत ने उस फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी किया था, लेकिन आदेश पर रोक नहीं लगाई थी।

उन्होंने कहा कि लंबित याचिका अब बेअसर हो गई है, क्योंकि 2019 की महाराष्ट्र विधानसभा भंग हो चुकी है और 2024 के चुनावों के बाद नयी विधानसभा का गठन हो गया है।

कौल ने ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव मामले’ में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ‘चिह्न आदेश’ के तहत निर्वाचन आयोग का निर्णय ‘दसवीं अनुसूची’ के तहत विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के अनुरूप हो, यह जरूरी नहीं है, क्योंकि दोनों प्राधिकार अलग-अलग काम करते हैं और अलग-अलग पहलुओं पर विचार करते हैं।

उन्होंने कहा कि फैसले में यह तय करने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग पर छोड़ दी गई थी कि किसी खास विवाद से जुड़ी परिस्थितियों में कौन-सा परीक्षण या परीक्षणों का कौन-सा संयोजन सही रहेगा।

न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों को आरक्षित चुनाव चिह्न देने से इनकार करने की संभावना पर विचार किया था।

उन्होंने कहा कि न्यायिक समीक्षा अदालत को निर्वाचन आयोग के विवेक की जगह अपना विवेक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देती है।

हालांकि, न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत यह जांच कर सकती है कि क्या प्रासंगिक पहलुओं और संभावित परिणामों पर उचित रूप से विचार किया गया था।

कौल ने कहा कि विधायी बहुमत परीक्षण ‘चिह्न आदेश’ के तहत एक वैध और प्रासंगिक विकल्प है। उन्होंने इसके लिए शीर्ष अदालत के ‘सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया।

कौल ने कहा कि पद से अयोग्यता की याचिका दायर होने पर विधायी संख्या-बल को पूरी तरह नजरअंदाज करने से ऐसी बेबुनियाद कार्यवाही का मौका मिल सकता है, जिनका मकसद निर्वाचन आयोग को चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन की जांच करने से रोकना हो।

मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।

यह मामला उद्धव खेमे की ओर से दायर उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देने के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती दी गई है।

इस विवाद में महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को दी गई चुनौती भी शामिल है, जिसमें उन्होंने शिंदे खेमे के विधायकों को पद से अयोग्य ठहराने से इनकार कर दिया था।

उद्धव खेमे का कहना है कि शिंदे गुट की ओर से शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल अवैध है। उसने शीर्ष अदालत से चुनाव चिह्न बहाल करने या शिंदे गुट को इसके इस्तेमाल से रोकने का अनुरोध किया है।

भाषा पारुल नरेश

नरेश

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