नयी दिल्ली, 25 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने एक महिला द्वारा उत्तर प्रदेश में उसके सास-ससुर और ननद के खिलाफ दर्ज कराया गया दहेज उत्पीड़न का मामला बुधवार को खारिज कर दिया और कहा कि वैवाहिक विवादों में अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक अभियोजन शुरू करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें शिकायतकर्ता की ननद और सास-ससुर के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए (वैवाहिक क्रूरता), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और दहेज निषेध अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
पीठ ने कहा कि आपराधिक कानून को पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ ‘‘व्यक्तिगत प्रतिशोध’’ लेने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए, और अदालतों को ऐसे मामलों में सतर्क रहना चाहिए जहां ठोस सबूतों के बिना आरोप लगाए जाते हैं।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि अप्रैल 2017 में शादी के बाद उसके पति और ससुराल वालों ने दहेज के रूप में 8.5 लाख रुपये और एक कार की मांग की तथा उसके साथ क्रूरता की।
शिकायतकर्ता ने उनपर 2017 में गर्भावस्था के दौरान मारपीट करने का भी आरोप लगाया था, जिसके कारण उसका गर्भपात हो गया था। महिला ने अपने ससुर पर छेड़छाड़ के आरोप भी लगाए थे।
भाषा शफीक सुरेश
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