(तस्वीरों सहित)
नयी दिल्ली, 26 अप्रैल (भाषा) भारत के विविध रूपों को अपने कैमरे में कैद करने वाले देश के प्रख्यात छायाकारों में से एक रघु राय का रविवार तड़के यहां एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे।
रघु राय के बेटे एवं छायाकार नितिन राय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘पिताजी को दो साल पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ था, लेकिन बाद में उन्हें राहत मिलने लगी थी। फिर कैंसर पेट तक फैल गया, जो ठीक हो गया था। हाल में यह मस्तिष्क तक पहुंच गया था और उन्हें उम्र संबंधी अन्य तकलीफें भी थीं।’’
रघु राय के परिवार में उनकी पत्नी गुरमीत, बेटे नितिन और तीन बेटियां—लगन, अवनि और पूर्वाई हैं।
इस बीच, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रघु राय के निधन पर शोक व्यक्त किया और कहा कि उनकी फोटोग्राफी में असाधारण संवेदनशीलता, गहराई और विविधता थी।
पंजाब प्रांत के झांग शहर में (अब पाकिस्तान में) 18 दिसंबर 1942 को जन्मे राय ने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी, लेकिन 23 साल की उम्र में उन्होंने कैमरा थाम लिया और 1966 में ‘द स्टेट्समैन’ अखबार के मुख्य छायाकार बन गए।
उसके बाद के छह दशक किसी धुंधली स्मृति की तरह नहीं गुजरे, बल्कि हर पल दर्ज होता रहा। रघु राय का कैमरा भारत के सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का मूक गवाह बनता रहा।
मशहूर फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर-ब्रेसन के शागिर्द रहे रघु राय ने भारतीय इतिहास के कुछ सबसे मर्मस्पर्शी पलों को अपने कैमरे में कैद किया, फिर चाहे वह 1972 का बांग्लादेश शरणार्थी संकट हो या 1984 की भोपाल गैस त्रासदी।
उन्होंने इंदिरा गांधी, दलाई लामा, मदर टेरेसा, सत्यजीत राय, हरिप्रसाद चौरसिया और बिस्मिल्ला खां जैसी प्रमुख हस्तियों की तस्वीरों के माध्यम से भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक रंगों को इस तरह कैद किया, जिसने उनके जीवन को एक बिल्कुल नए स्वरूप में पेश किया और उनके अनछुए पहलुओं को दर्शाया।
रोजमर्रा की सुर्खियों से कहीं आगे, रघु राय के कैमरे ने आम आदमी और साधारण जीवन को उतनी ही, बल्कि उससे भी अधिक संजीदगी एवं गहराई के साथ दर्ज किया। उनके फ्रेम में साधारण भी असाधारण बन उठता था, मानो अक्सर इन श्वेत-श्याम तस्वीरों में वह जीवन की कठोरता को कम करना चाहते हों।
‘पीटीआई-भाषा’ को 2023 में दिए एक साक्षात्कार में रघु राय ने कहा था कि कैमरे से पलों को कैद करने की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह आपको जीवन और उसकी अनंत परिवर्तनशीलता से रूबरू कराता है।
उन्होंने कहा था, ‘‘55 से अधिक साल हो गए हैं, लेकिन फोटोग्राफी की सबसे बड़ी ताकत यही है-जीवन और प्रकृति हमेशा बदलते रहते हैं, हमेशा चुनौती देते रहते हैं और यही आपको झकझोर देता है।’’
उनकी तस्वीरें भारत की सामूहिक स्मृति में हमेशा के लिए अंकित हो गई हैं। भोपाल गैस त्रासदी की सबसे मर्मभेदी तस्वीरों में से एक रही- एक शिशु की आंखें खुली हुई हैं और एक हाथ उसे अनंत निद्रा में थपथपाता हुआ। यह तस्वीर आज भी देखने वाले को भीतर तक हिला देती है।
उनकी एक और बेहद चर्चित तस्वीर में कांग्रेस के तमाम पुरुष मंत्री इंदिरा गांधी के इर्द-गिर्द सिमटे खड़े हैं, जबकि वे अपनी मेज पर बैठी हैं। तस्वीर का कैप्शन बेहद सादा है-‘इंदिरा गांधी विद कांग्रेस मेन, दिल्ली, 1967।’
दोनों तस्वीरों का यह तीखा विरोधाभास एक ऐसे छाया पत्रकार की छाया उभारता है, जो अपने विषय के इतना करीब था कि असहज कर दे।
‘म्यूजियो कैमरा’ के संस्थापक फोटोग्राफर आदित्य आर्या ने कहा कि रघु राय ने भारतीय पत्रकारिता को ऐसी फोटोग्राफी से परिचित कराया, जिसमें आप विषय के साथ एकाकार हो जाते थे।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘छाया पत्रकारिता बहुत बदल गई है। वह ‘वाइड एंगल लेंस’ के साथ घटना के बीचोंबीच होते थे। आज छाया पत्रकार बड़े टेलीफोटो लेंस के साथ 300-400 फुट दूर से काम करते हैं, क्योंकि आपको हस्तियों के करीब जाने की इजाजत नहीं मिलती। उनकी तस्वीरें देखकर समझ आता है कि जब आप घटना के बीच में होते हैं, तो सब कुछ कितना अलग दिखता है।’’
वाराणसी उन्हें बेहद आकर्षित करती थी।
श्मशान के शांत अनुष्ठानों से लेकर गंगा आरती के अध्यात्म तक, व्यस्त गलियों की आपाधापी से लेकर चाय की दुकानों पर होने वाली गहन बहसों तक- रघु राय के कैमरे ने इस पवित्र नगरी को उसके असली और बेलाग रूप में कैद किया।
खुद को रघु राय का ‘‘बेटा और दोस्त’’ मानने वाले छायाकार समर जोधा कहते हैं कि उन्होंने एक ऐसा बनारस देखा, जो ‘‘अपनी छवि से अनजान था, जिसने अभी कैमरे के लिए पोज देना नहीं सीखा था।’’
जोधा ने कहा कि राय की असली पहचान मशहूर हस्तियों की नहीं, बल्कि आम इंसान की कहानियों में थी।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘वे सच में आम लोगों के साथ, आम परिस्थितियों में काम करते थे। और यही तस्वीर बनाने की असली कसौटी है।’’
जोधा ने कहा, ‘‘उनमें वह चीज थी, जिसे हम हिंदी, उर्दू और पंजाबी में ‘जुनून’ कहते हैं। वह खास दीवानगी, जो आपको आगे बढ़ाती रहती है, चाहे रास्ते में कुछ भी आए। लोगों को खुश करने की फिक्र नहीं, दुनिया से समझौता नहीं- बस सच के प्रति वह जिद्दी और धधकती ललक।’’
अपने लंबे करियर में उन्होंने ‘संडे’ और ‘इंडिया टुडे’ जैसी प्रमुख भारतीय पत्रिकाओं के साथ काम किया। ‘टाइम’, ‘लाइफ’, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘द इंडिपेंडेंट’ और ‘द न्यू यॉर्कर’ जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में उनके फोटो निबंध छपे।
वर्ष 1977 में कार्टियर-ब्रेसन की सिफारिश पर वह दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित फोटोग्राफी संस्था ‘मैग्नम फोटोज’ के सदस्य बने। ‘वर्ल्ड प्रेस फोटो’ की जूरी में तीन बार और यूनेस्को की अंतरराष्ट्रीय फोटो प्रतियोगिता की जूरी में दो बार उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।
सम्मान एवं पुरस्कारों की बात करें, तो 1972 में बांग्लादेश युद्ध की कवरेज और उसके बाद कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके राय को ‘पद्मश्री’ से भी नवाजा गया। ‘नेशनल ज्योग्राफिक’ में प्रकाशित उनके फोटो निबंध ‘ह्यूमन मैनेजमेंट ऑफ वाइल्डलाइफ इन इंडिया’ के लिए उन्हें अमेरिका में ‘फोटोग्राफर ऑफ द ईयर’ का खिताब मिला।
फ्रांस सरकार ने 2009 में उन्हें अपने प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑफिसर डेस आर्ट्स एट डेस लेट्रेस’ से विभूषित किया।
रघु राय ने कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखीं, जिनमें ‘रघु रायज इंडिया: रिफ्लेक्शन्स इन कलर एंड रिफ्लेक्शन्स इन ब्लैक एंड व्हाइट’ और ‘एक्सपोज़र: पोर्ट्रेट ऑफ ए कॉरपोरेट क्राइम’ प्रमुख हैं। 2010 में स्थापित रघु राय फाउंडेशन उनकी 50,000 से अधिक तस्वीरों को संजोए हुए है। वह अपनी 57वीं किताब पर काम कर रहे थे।
राजनीतिक और रचनात्मक जगत के लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘ रघु राय जी को एक ऐसे रचनात्मक दिग्गज के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने अपने लेंस से भारत की जीवंतता को कैद किया। उनकी फोटोग्राफी में असाधारण संवेदनशीलता, गहराई और विविधता थी। उनकी फोटोग्राफी ने लोगों को भारत में जीवन के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया।’’
मोदी ने कहा, ‘‘रघु राय का निधन फोटोग्राफी और संस्कृति जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार, प्रशंसकों और फोटोग्राफी जगत के साथ हैं। ओम शांति।’’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘रघु राय जी के कैमरे ने छह दशकों से अधिक समय तक भारत की आत्मा, इसके लोगों, संघर्षों, खुशियों और निर्णायक क्षणों को चित्रित किया।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने केवल तस्वीरें नहीं खींचीं, बल्कि हमारे राष्ट्र की स्मृतियों को सहेज कर रखा।’’
गांधी ने कहा, ‘‘उनके परिवार, सहयोगियों और उनके काम से पीढ़ियों तक प्रभावित हुए अनगिनत प्रशंसकों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं।’’
शशि थरूर ने ‘एक्स’ पर लिखा कि रघु राय से उनका नाता बचपन तक जाता है, क्योंकि उनके पिता और राय ‘द स्टेट्समैन’ में सहयोगी थे।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे लिए वह सिर्फ एक वैश्विक नाम नहीं थे-वह उस सौम्य मुस्कान और पैनी नजर वाले इंसान थे, जिन्होंने मेरे पिता की पीढ़ी के पत्रकारों को प्रेरित किया।’’
थरूर ने कहा कि दृश्य इतिहास में उनका योगदान अतुलनीय है।
बीजू जनता दल (बीजद) अध्यक्ष नवीन पटनायक ने कहा कि उनके फ्रेम महज तस्वीरें नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास थे।
गीतकार-लेखक वरुण ग्रोवर ने उन्हें ‘‘मौन कथाकार, प्रकाश के व्याख्याता और सबसे कोमल व दयालु इंसान’’ बताया।
राय का अंतिम संस्कार रविवार को लोधी श्मशान घाट पर किया गया।
भाषा
देवेंद्र दिलीप
दिलीप