पूर्व डीटीसी चालक 2011 के सड़क हादसा मामले में बरी

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पूर्व डीटीसी चालक 2011 के सड़क हादसा मामले में बरी

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  • Publish Date - July 5, 2026 / 12:25 PM IST,
    Updated On - July 5, 2026 / 12:25 PM IST

नयी दिल्ली, पांच जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने 15 साल पुराने सड़क हादसा मामले में दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के एक पूर्व चालक को लापरवाही से बस चलाने के आरोप से बरी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को ‘‘अविश्वसनीय गवाही’’ के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

इस हादसे में एक महिला की मौत हो गई थी।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धीरेंद्र राणा ने पूर्व चालक श्याम सुंदर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। एक मजिस्ट्रेट अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए (लापरवाही से मौत का कारण बनना) और धारा 279 (लापरवाही एवं तेज गति से वाहन चलाना) के तहत दोषी ठहराते हुए पिछले वर्ष मई में 18 महीने के कारावास की सजा सुनाई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सुंदर 25 अक्टूबर 2011 को शंकर रोड पर लापरवाही से बस चला रहा था, जिसकी चपेट में आने से चंद्रावती नाम की महिला की मौत हो गई थी।

अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह चश्मदीद गवाह और चंद्रावती के पति कुलचंदर की गवाही पर आधारित था।

अदालत ने इस बात पर संदेह जताया कि महिला का पति हादसे के समय घटनास्थल पर मौजूद था।

उसने कहा, ‘‘यदि अभियोजन पक्ष का पहला गवाह कुलचंदर घटनास्थल पर मौजूद था तो पति होने के नाते वह स्वाभाविक रूप से पहला कदम यह उठाता कि पुलिस को तुरंत सूचित करता और टक्कर मारने वाले वाहन का नंबर बताता ताकि आरोपी को वाहन समेत पकड़ा जा सके।’’

अदालत ने कहा, ‘‘यदि वह महिला के साथ अस्पताल गया था तो चिकित्सक ने उसके बजाय उसके बेटे का नाम क्यों दर्ज किया। यह भी अदालत की समझ से परे है। यदि उसने टक्कर मारने वाले वाहन को देखा और उसका नंबर लिख लिया था, तो चिकित्सक को यह क्यों बताया गया कि महिला को किसी अज्ञात वाहन ने टक्कर मारी थी।’’

उसने कहा कि जिरह के दौरान पति ने यह दावा कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की कि उसने पीड़िता को अस्पताल में भर्ती कराया था जबकि यह बात चिकित्सकीय कानूनी रिपोर्ट (एमएलसी) के विवरण से मेल नहीं खाती।

अदालत ने कहा कि पति के ‘‘अस्वाभाविक आचरण’’ को देखते हुए घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी ‘‘गंभीर रूप से संदेह के घेरे में’’ है।

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने महिला के बेटे से पूछताछ नहीं की जबकि वह भी हादसे का चश्मदीद था। उसे गवाह नहीं बनाए जाने का कोई उचित कारण भी नहीं बताया गया।

अदालत ने कहा कि केवल हादसा हो जाने के आधार पर वाहन चालक को दंडित नहीं किया जा सकता और यह साबित करना जरूरी है कि हादसा उसकी लापरवाही या तेज गति से वाहन चलाने के कारण हुआ।

बचाव पक्ष ने बस की घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाया था। अदालत ने इस दलील पर गौर करते हुए घटनाक्रम को व्यावहारिक रूप से असंभव बताया।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार बस सुबह आठ बजकर 40 मिनट पर तिलक नगर डिपो से रवाना हुई थी और ऐसे में यह ‘‘बेहद संदिग्ध’’ है कि सुबह के व्यस्त यातायात के बीच वह कई बस स्टॉप पर रुकते हुए 16 से 18 किलोमीटर की दूरी केवल 35 मिनट में तय करके सुबह नौ बजकर 15 मिनट पर घटनास्थल पहुंची।

अदालत ने कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और 304-ए के तहत आरोपी श्याम सुंदर के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा, क्योंकि लापरवाही साबित करने वाला एकमात्र गवाह विश्वसनीय नहीं है।’’

भाषा सिम्मी रंजन

रंजन