आबकारी मामला: न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई से अलग करने के अनुरोध के साथ केजरीवाल अदालत में पेश

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आबकारी मामला: न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई से अलग करने के अनुरोध के साथ केजरीवाल अदालत में पेश

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  • Publish Date - April 6, 2026 / 09:10 PM IST,
    Updated On - April 6, 2026 / 09:10 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

नयी दिल्ली, छह अप्रैल (भाषा) दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को आबकारी नीति मामले में उन्हें तथा अन्य सभी आरोपियों को आरोप मुक्त किए जाने के फैसले के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई से अलग किए जाने का अनुरोध किया।

न्यायमूर्ति शर्मा ने उन्हें मामले की सुनवाई से अलग किए जाने की केजरीवाल की अर्जी को रिकॉर्ड में ले लिया और इसकी सुनवाई 13 अप्रैल को तय की।

न्यायमूर्ति शर्मा को बताया गया कि मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय की अन्य पीठ को सौंपने के अनुरोध को लेकर शीर्ष अदालत में दाखिल याचिका वापस ले ली गई है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि केजरीवाल के अलावा आम आदमी पार्टी (आप) के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक तथा विजय नायर और अरुण रामचंद्र पिल्लई सहित अन्य प्रतिवादियों ने भी न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई से अलग किए जाने के अनुरोध के साथ आवेदन दाखिल किए हैं।

उच्च न्यायालय ने केजरीवाल और अन्य प्रतिवादियों को सीबीआई की मुख्य याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए 10 अप्रैल तक का समय “अंतिम अवसर” के रूप में दिया।

सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालत नौटंकी का मंच नहीं है और अगर केजरीवाल मामले में व्यक्तिगत रूप से पेश होना चाहते हैं, तो उन्हें अपने वकील को हटा देना चाहिए।

यह पहली बार नहीं है, जब केजरीवाल ने अदालती कार्यवाही में खुद दलीलें पेश की हों।

आबकारी नीति से जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मामले में जब निचली अदालत ने 28 मार्च 2024 को केजरीवाल की हिरासत अवधि बढ़ा दी थी, तब ‘आप’ संयोजक ने न्यायाधीश को संबोधित करते हुए सवाल किया था कि क्या एक पदस्थ मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। न्यायाधीश ने केजरीवाल के वकील के मौजूद होने के बावजूद उन्हें बहस करने की अनुमति दे दी थी।

मेहता ने सोमवार को केजरीवाल की अर्जी पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से “संस्था” पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद एवं अपमानजनक हैं।

उन्होंने कहा, “इस देश में कुछ लोग हर किसी पर बेबुनियाद आरोप लगाना अपना पेशा बना लेते हैं। इसे गंभीरता से लेना होगा। यह संस्था के खिलाफ आरोप है और हमें उस संस्था का समर्थन करना होगा।”

मेहता ने उच्च न्यायालय को बताया कि आरोपमुक्त किए गए सात आरोपियों ने एक “सुनियोजित योजना” के तहत न्यायमूर्ति शर्मा को इस मामले की सुनवाई से अलग करने के अनुरोध को लेकर अदालत का रुख किया है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा, “अगर कोई और अर्जी दाखिल करना चाहता है, तो कृपया ऐसा करें, ताकि मैं इस पर एक बार में अंतिम फैसला ले सकूं।”

केजरीवाल ने कहा कि वह न्यायमूर्ति शर्मा को सुनवाई से अलग करने के अनुरोध वाली अर्जी पर खुद ही बहस करेंगे और बाद में किसी वकील द्वारा पैरवी किए जाने के सिलसिले में अपने “कानूनी अधिकारों” का इस्तेमाल करेंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री ने अदालत से अनुरोध किया कि उनकी अर्जी को रिकॉर्ड में लिया जाए, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से पेश होने वाला वादी होने के नाते वह इसे उच्च न्यायालय के पोर्टल पर दाखिल करने में असमर्थ थे।

मेहता ने कहा कि न्यायामूर्ति शर्मा को मामले की सुनवाई से अलग करने के अनुरोध वाली याचिका पर सीबीआई का जवाब एक नोट के रूप में तैयार है।

सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि जैसा कि उन्होंने पहले ही “भविष्यवाणी” कर दी थी, केजरीवाल की ओर से मौजूदा कार्यवाही के सिलसिले में उच्चतम न्यायालय में दायर की गई याचिकाएं अभी भी शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में लंबित हैं।

प्रतिवादियों में से एक की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि मामले को दूसरे न्यायाधीश के पास स्थानांतरित करने के अनुरोध को लेकर शीर्ष अदालत में दायर याचिका वापस ले ली गई है।

बाद में उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि कुछ प्रतिवादियों ने दो मौकों पर समय देने का अनुरोध करने के बावजूद सीबीआई की मुख्य याचिका पर अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।

उच्च न्यायालय ने केजरीवाल और अन्य प्रतिवादियों को जवाब दाखिल करने के लिए 10 अप्रैल तक का समय “अंतिम अवसर” के रूप में दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर प्रतिवादी तब तक जवाब दाखिल करने में विफल रहते हैं, तो ऐसा करने का विकल्प समाप्त हो जाएगा।

निचली अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को आरोप मुक्त कर दिया था और सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा था कि उसका मामला न्यायिक कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और पूरी तरह से बेबुनियाद साबित हुआ।

न्यायमूर्ति शर्मा ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर नौ मार्च को सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया। नोटिस में कहा गया कि आरोप तय करने के चरण में निचली अदालत की कुछ टिप्पणियां और निष्कर्ष प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण प्रतीत होते हैं तथा उन पर विचार किए जाने की जरूरत है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने आबकारी नीति मामले में सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के सिलसिले में निचली अदालत की सिफारिश पर भी रोक लगा दी थी।

बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने सीबीआई की याचिका को न्यायमूर्ति शर्मा से किसी अन्य न्यायाधीश को स्थानांतरित करने के केजरीवाल के अनुरोध को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का निर्णय संबंधित न्यायाधीश को लेना होगा।

केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने 11 मार्च को दायर अर्जी में दावा किया कि इस बात की “प्रबल, वास्तविक और उचित आशंका” है कि न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष मामले की सुनवाई निष्पक्ष एवं तटस्थ नहीं होगी।

उच्च न्यायालय के इनकार के बाद केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने सीबीआई की याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति शर्मा की पीठ से किसी अन्य पीठ को स्थानांतरित करने के अनुरोध को लेकर शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

भाषा पारुल माधव

माधव