नफरती भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए वर्तमान कानून पर्याप्त, हस्तक्षेप की जरूरत नहीं: न्यायालय

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नफरती भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए वर्तमान कानून पर्याप्त, हस्तक्षेप की जरूरत नहीं: न्यायालय

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  • Publish Date - April 29, 2026 / 11:59 AM IST,
    Updated On - April 29, 2026 / 11:59 AM IST

नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि नफरत फैलाने वाले भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और इसीलिए इसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि अपराध तय करना और दंड का निर्धारण पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान के अनुसार न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती और ना ही अपराधों की परिभाषा को अपने आदेशों से व्यापक कर सकती है।

याचिकाओं में किये गए अनुरोधों के अनुसार आदेश पारित करने से इनकार करते हुए पीठ ने मौजूदा आपराधिक कानून का उल्लेख किया और कहा कि इसमें नफरत फैलाने वाले भाषणों के मुद्दे से निपटने के लिए प्रावधान मौजूद हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘इस न्यायालय के पूर्व निर्णयों से लगातार इसकी पुष्टि होती है कि यद्यपि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर सकती हैं, लेकिन वे कानून नहीं बना सकतीं या कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।’’

पीठ ने कहा कि उभरती सामाजिक चुनौतियों के आलोक में नये कानून बनाना या पुराने कानूनों में बदलाव करना सरकार और विधायिका का काम है। पीठ ने कहा कि वे चाहें तो विधि आयोग की मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिये गए सुझावों पर भी विचार कर सकते हैं।

भाषा अमित मनीषा

मनीषा