(गुंजन शर्मा)
नयी दिल्ली, 22 फरवरी (भाषा) भारत के हिमालयी क्षेत्र में किसान- उत्पादक संगठनों के माध्यम से स्थानीय नेतृत्व और एजेंसी संचालित प्रयासों ने किसानों की आय में सुधार, फसल उत्पादन में वृद्धि और कृषि प्रणाली की मजबूती के जरिए जलवायु नीति में व्यापक बदलाव को संभव बनाया है। भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम), लखनऊ के एक अध्ययन में यह बात सामने आयी।
इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित “जर्नल ऑफ रूरल स्टडीज” में प्रकाशित हुए हैं।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, लखनऊ के एसोसिएट प्रोफेसर कुशांकुर डे ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “हमने हिमालयी क्षेत्र में स्थानीय जलवायु जोखिमों से उत्पन्न संवेदनशीलता को समझने और उसका मूल्यांकन करने के लिए मिश्रित पद्धति शोध दृष्टिकोण को अपनाया। इसके तहत हमने किसान संगठनों की शासन क्षमताओं को यह आंकने के लिए मापा कि वे योजनाबद्ध या तात्कालिक अनुकूलन कार्रवाई को जलवायु-स्मार्ट तकनीक और प्रथाओं के माध्यम से कैसे मूल्यांकित, प्राथमिकता और निष्पादित करते हैं। इसके लिए हमने सहभागी मानचित्रण टूल (नेट-मैप), अर्द्ध-संरचित साक्षात्कार, केंद्रित समूह चर्चाएं और रिकॉर्ड किए गए साक्षात्कार की कोडिंग की।”
यह अध्ययन जलवायु नीति संबंधी चर्चाओं का ध्यान मुख्य रूप से प्रतिक्रियात्मक और खंडित दृष्टिकोणों से हटाकर, जो कई विकासशील क्षेत्रों में आम हैं, अनुकूलन के लिए अधिक सक्रिय दृष्टिकोण की ओर ले जाता है।
यह अध्ययन जलवायु कार्रवाई (अनुकूलन) शोध के अपेक्षाकृत कम अन्वेषित क्षेत्र पर ध्यान देता है—विशेषकर एजेंसी-नेतृत्व वाले अनुकूलन की शासन क्षमता को। खास तौर पर उन परिस्थितियों में, जहां स्थानीय सत्ता-संतुलन और शक्ति-गतिशीलताएं अनुकूलन प्रयासों और उनके परिणामों को प्रभावित, बाधित या जटिल बना सकती हैं।
यह पता लगाने के लिए क्या एजेंसी-नेतृत्व वाली शासन प्रणाली स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली परिणाम उत्पन्न कर सकती है, शोध टीम ने उन जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन किया, जहां कृषि स्तर पर अनुकूलन प्रयासों के बावजूद बस्तियाँ जलवायु खतरों से उत्पन्न जोखिम के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं।
डे ने कहा, ‘‘निष्कर्षों से पता चला कि किसान-उत्पादक संगठन (एफपीओ), अपने सदस्यों की ओर से सामूहिक रूप से कार्य करते हुए, ऐसे जलवायु हस्तक्षेप किए जिन्होंने किसानों की आय बढ़ाई, स्थानीय कृषि प्रणालियों और उनके लचीलेपन को मजबूत किया, फसल उत्पादन में सुधार किया, सहयोग बढ़ाया, जानकारी साझा करने को बढ़ाया और कार्रवाई के दौरान प्रत्युत्तरात्मक निगरानी लागू की, ताकि जलवायु कार्रवाई नीति प्रक्रियाओं के ‘मूल्यांकन विरोधाभास’ को हल किया जा सके।’’
शोध दल ने निष्कर्ष निकाला कि इन “छोटी सफलताओं” ने ऐसे सहायक तंत्रों का निर्माण किया, जहाँ स्थानीय सफलताओं ने व्यापक सामूहिक कार्रवाई और अनुकूलन कार्यों के क्षैतिज प्रसार को प्रोत्साहित किया।
भाषा
प्रशांत दिलीप
दिलीप