(मनीष सेन)
नयी दिल्ली, एक जुलाई (भाषा) पंडित हरिप्रसाद चौरसिया ने बुधवार को अपने 88वें जन्मदिन पर कहा कि बांसुरी उनके व्यक्तित्व का सिर्फ एक हिस्सा भर नहीं, बल्कि यह उनका परिवार भी है, एक ऐसा परिवार जो उन्हें जन्म से मिला और जिसने उन्हें एक संगीतकार के तौर पर पहचान दी।
अपनी असाधारण प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले चौरसिया ने अपने अतीत के अनुभव पर नजर डालते हुए कहा कि बांसुरी हमेशा उनकी साथी रही है।
चौरसिया ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘बांसुरी मेरा परिवार है और हमेशा मेरा परिवार ही रहेगी। जब तक मैं यहां हूं और मेरी बांसुरी मेरे साथ है, यह परिवार चलता रहेगा। और लोग, चाहे उन्हें ये पसंद हो या न हो, किसी भी दूसरे वाद्ययंत्र की तुलना में बांसुरी को ज्यादा सुनेंगे।’’
लोगों के बीच ‘पंडितजी’ नाम से प्रख्यात चौरसिया अपने जन्मदिन के मौके पर दिल्ली में थे। यहां उनके बेटे राजीव द्वारा तैयार किए गए संगीत कार्यक्रम ‘बांसुरी जब गाने लगे’ का आयोजन किया गया था।
पंडित हरिप्रसाद की बहू और ओडिसी नृत्यांगना पुष्पांजलि चौरसिया द्वारा लिखित और ‘एचसीएल कॉन्सर्ट्स’ द्वारा प्रस्तुत यह कार्यक्रम, भारत के सबसे मशहूर शास्त्रीय संगीतकारों में से एक के जीवन को उन किरदारों और अनुभवों के नाटकीय चित्रण के जरिए दिखाता है जिन्होंने उनके सफर को आकार दिया।
इस प्रस्तुति में भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय गाने शामिल हैं, जिन्हें चौरसिया ने बांसुरी पर अपनी सुरीली धुनों से पिरोया है।
चौरसिया ने कहा, ‘‘यह प्रस्तुति उनकी (राजीव और पुष्पांजलि) है। जब मैं अपना खुद का कुछ बनाऊंगा, तब आप उसे देखेंगे। बांसुरी ही मेरी जिंदगी है।’’
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में 1938 में आज ही के दिन जन्मे बांसुरी-वादक हरिप्रसाद ने अपने शुरुआती संगीत की शिक्षा अपने पिता से छिपकर ली थी क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि बेटा भी उन्हीं की तरह पहलवान बने।
भाषा शफीक खारी
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