देहरादून, 28 अप्रैल (भाषा) उत्तराखंड में इस साल वनाग्नि की अब तक हुई 226 घटनाओं में कुल 144.22 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है जिसे लेकर गर्मी में पर्यटन का सीजन शुरू होने से पहले ही आतिथ्य क्षेत्र में चिंता पैदा हो गयी है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 15 फरवरी से 27 अप्रैल तक की अवधि में जंगल की आग से गढ़वाल क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हुआ जहां 177 घटनाओं में 110.52 हेक्टेयर वन भूमि को नुकसान पहुंचा जबकि कुमाऊं क्षेत्र में 28 घटनाओं में 21.15 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। वन्यजीव क्षेत्रों में वनाग्नि की 21 घटनाएं हुईं जिनमें 12.55 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ ।
जंगलों में आग लगने की बढ़ती घटनाओं ने पर्यटन उद्योग के समक्ष चिंता पैदा कर दी है। कौसानी, अल्मोड़ा और नैनीताल सहित प्रमुख पर्यटन क्षेत्रों में आतिथ्य क्षेत्र से जुड़े हितधारकों को डर है कि बढ़ती गर्मी और धुएं के कारण कम दृश्यता पर्यटकों के यात्रा निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं ।
कौसानी होटल संघ के अध्यक्ष बलवंत नेगी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘हमारा मुख्य पर्यटन सीजन मई के पहले सप्ताह में शुरू होकर जून के अंत तक चलता है। जब पर्यटकों को जंगल की आग के कारण कम दृश्यता और गर्मी के बारे में पता चलता है, तो वे आने से बचते हैं।’
नेगी ने बताया कि बागेश्वर जिले के कौसानी और बैजनाथ धाम में प्रतिदिन लगभग 1,200 पर्यटक आते हैं और पिछले सप्ताह अनाशक्ति आश्रम क्षेत्र के पास के वन क्षेत्र में आग लगने की घटनाओं के बाद से वहां के लोगों में चिंता है। उन्होंने बताया कि जिले में लगभग 150 होटल और ‘होम स्टे’ हैं ।
अल्मोड़ा में पीक सीजन के दौरान होटल और होम स्टे 90 फीसदी तक भरे रहते हैं लेकिन अभी वहां केवल 40 फीसदी ही लोग आए हैं ।
अल्मोड़ा होटल संघ के अध्यक्ष अरुण वर्मा ने कहा, ‘मुख्य समस्या गर्मी और प्रदूषण है। पीक सीजन के दौरान हमारे यहां दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और गुजरात से प्रतिदिन 5,000 से 7,000 पर्यटक आते हैं । जंगलों में आग लगने की घटनाएं एक बड़ी चिंता का विषय हैं।’
नैनीताल होटल और रेस्टोरेंट एसोसिएशन के सचिव वेद शाह ने जंगलों में लगने वाली आग से बचाव के उपायों जैसे प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती किए जाने पर जोर दिया।
वनाग्नि के लिए नियुक्त नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक ने बताया कि वन विभाग पूरी सतर्कता बरत रहा है। उन्होंने कहा, ‘हम जंगलों में आग लगने की घटनाओं पर नजर रख रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे फैलें नहीं। वनाग्नि से निपटने के लिए हमारे कर्मचारियों को आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं।’
भाषा दीप्ति संतोष
संतोष