नयी दिल्ली, नौ जून (भाषा) कक्षा नौवीं के छात्रों के लिए एक जुलाई से दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं के अध्ययन को अनिवार्य करने संबंधी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की त्रि-भाषा नीति को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक नयी याचिका दायर की गई है।
शिक्षाविद और महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री डॉ. फौजिया खान की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि सीबीएसई का 15 मई का परिपत्र मनमाना और अनुचित है।
याचिका में मुख्य मामले में हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए कहा गया है, ‘‘विवादित परिपत्र में शिक्षकों की कमी को स्वीकार किया गया है, फिर भी अनुपालन अनिवार्य किया गया है। नतीजा यह है कि व्यवहारिक रूप से दक्षिणी राज्यों में तीसरे भाषा के रूप में हिंदी को अनिवार्य करना होगा और उत्तरी राज्यों में संस्कृत को।’’
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) से ताल्लुक रखने वालीं खान ने कहा कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी या संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाने के लिए मजबूर करना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लंघन है।
उच्चतम न्यायालय ने 27 मई को सीबीएसई की तीन भाषाओं के अध्ययन को अनिवार्य बनाने वाली नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था।
सीबीएसई द्वारा जारी एक हालिया परिपत्र के अनुसार, एक जुलाई से कक्षा नौ के छात्रों के लिए कम से कम दो भारतीय भाषाओं सहित तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है।
यह कदम सीबीएसई द्वारा अपनी अध्ययन योजनाओं को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय विद्यालय शिक्षा पाठ्यक्रम (एनसीएफ-एसई) 2023 के अनुरूप करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
बोर्ड ने कहा, ‘‘माध्यमिक स्तर पर अपेक्षित दक्षताओं को पर्याप्त रूप से पूरा करने के लिए इन पाठ्यपुस्तकों के साथ स्कूलों द्वारा चयनित एक उपयुक्त स्थानीय या राज्य स्तरीय साहित्यिक सामग्री, जैसे लघु कथाएं, कविताएं या कथेतर रचनाएं जोड़ी जाएंगी।’’
बोर्ड ने कहा कि पूरक साहित्यिक सामग्री के चयन और शिक्षण में उपयोग के संबंध में विस्तृत दिशानिर्देश 15 जून तक जारी कर दिए जाएंगे।
भाषा सुरभि वैभव
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