नयी दिल्ली, 21 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के एक पूर्व अध्यक्ष ने दिल्ली तथा पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति में दो सिखों के नाम शामिल न किए जाने पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार पर “मनमाने चयन” की नीति अपनाने का आरोप लगाया है।
दूसरी ओर, सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि दोनों मामले अभी “विचारधीन” हैं और उनसे संबंधित फाइलें उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम को वापस नहीं भेजी गई हैं।
भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को लिखे पत्र में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष तरलोचन सिंह ने कहा कि उन्हें इस “बात की ओर ध्यान दिलाते हुए खेद हो रहा है” कि कॉलेजियम द्वारा अधिवक्ता मेजर नवदीप सिंह के नाम की सिफारिश किए जाने के बावजूद उन्हें पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं बनाया गया।
उन्होंने कहा कि इसी तरह न्यायिक अधिकारी गुरिंदरपाल सिंह को भी दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया गया।
तरलोचन सिंह ने कहा, “लोग इस बात से हैरान हैं कि जब लंबी प्रक्रिया के बाद उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायाधीशों के नामों को अंतिम मंजूरी दे दी जाती है, तो केंद्र सरकार ने मनमाने चयन की नीति क्यों अपनाई और दोनों बार अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को न्यायाधीश की नियुक्ति से वंचित कर दिया गया।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग नहीं देना चाहते, बल्कि दोनों मामलों में न्याय चाहते हैं।
उन्होंने कहा, “माननीय कानून मंत्री ने दोनों नामों को रोके जाने का कोई कारण नहीं बताया है।”
भाषा सुमित प्रशांत
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