नयी दिल्ली, 11 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश को स्थगित कर दिया जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष यतिन ओजा को राज्य न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए दोषी ठहराया गया था।
उच्च न्यायालय ने ओजा पर 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था और कहा था कि यदि जुर्माना अदा नहीं किया गया तो उन्हें दो महीने की साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।
ओजा को 20 दिसंबर 2025 को 19वीं बार गुजरात उच्च न्यायालय अधिवक्ता संघ का अध्यक्ष चुना गया था।
न्यायमूर्ति जे के माहेशवरी और न्यायमूर्ति ए एस चंदूरकर की पीठ ने आज सुनाए गए एक फैसले में निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ अपीलकर्ता द्वारा दिए गए आश्वासन के आलोक में उसके आचरण की हर दो वर्ष में एक बार नियमित समीक्षा करेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘ उच्च न्यायालय द्वारा विवादित आदेश में दिए गए कारणों के आधार पर इस न्यायालय द्वारा किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, अंतिम रूप से क्षमा का भाव दिखाते हुए, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए इस निर्णय के परिणामस्वरूप अपीलकर्ता की दोषसिद्धि तथा सजा को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित/स्थगित करने के इच्छुक हैं।’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वह ओज़ा की उस अपील पर सुनवाई कर रहा है जो उच्च न्यायालय के छह अक्टूबर, 2020 के फैसले के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें उन्हें दोषी ठहराया गया था। हालांकि, सजा का क्रियान्वयन 60 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया था।
इसके बाद शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा पर रोक को जारी रखा।
बाद में, उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने अप्रैल 2024 में कथित अनुशासनहीनता की एक नई घटना के बाद यतिन ओजा की ‘सीनियर एडवोकेट’ की उपाधि बहाल करने के फैसले को वापस लेने का संकल्प लिया।
दस्तावेजों के अनुसार, यह नवीनतम प्रस्ताव उस घटना के बाद आया जिसे यतिन ओजा और न्यायपालिका के बीच दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों के इतिहास में ‘छठी घटना’ बताया जा रहा है।
नौ अप्रैल 2024 को एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान यतिन ओजा ने कथित तौर पर सुनवाई कर रहे न्यायाधीश पर ‘फोरम शॉपिंग’ का आरोप लगाया था।
पूर्ण पीठ ने कार्यवाही की एक वीडियो क्लिप की समीक्षा के बाद यह टिप्पणी की कि ओजा बिना औपचारिक पेशी अधिकार के एक पक्ष की ओर से अदालत में उपस्थित हुए थे।
पूर्ण पीठ ने 15 अप्रैल 2024 के अपने निर्णय में कहा कि ओज़ा का आचरण एक वरिष्ठ अधिवक्ता के लिहाज से आशोभनीय था और उनकी टिप्पणियों का उद्देश्य अदालत पर ‘दबाव डालना’ था।
ओजा ने 2020 में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुजरात उच्च न्यायालय को ‘जुआरियों का अड्डा’ कहा था। उच्च न्यायालय ने जुलाई 2020 में ओझा से उनका वरिष्ठ पद छीन लिया था।
हालांकि, अक्टूबर 2021 में, उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए ओज़ा को एक जनवरी 2022 से शुरू होने वाली दो साल की परिवीक्षा अवधि के लिए उनका पद बहाल कर दिया था और इसे उनका ‘एक आखिरी मौका’ बताया था।
भाषा शोभना मनीषा
मनीषा