हिसार में नवजात की मौत पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग सख्त, एनआईसीयू सुविधाओं की समीक्षा के आदेश
हिसार में नवजात की मौत पर हरियाणा मानवाधिकार आयोग सख्त, एनआईसीयू सुविधाओं की समीक्षा के आदेश
चंडीगढ़, 13 जुलाई (भाषा) हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण हिसार में एक नवजात की मौत की घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्यभर में नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एनआईसीयू) सुविधाओं, रेफरल व्यवस्था और अस्पतालों के बीच समन्वय की समीक्षा के आदेश दिए हैं।
आयोग ने नवजात की मौत से जुड़ी खबरों के आधार पर स्वत: संज्ञान लेते हुए स्वास्थ्य विभाग सहित राज्य के संबंधित अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
मीडिया में आई खबरों के अनुसार, हिसार के सिविल अस्पताल में सिजेरियन प्रसव से जन्मे नवजात को जन्म के तुरंत बाद गंभीर श्वसन समस्या हुई और उसे एनआईसीयू में तत्काल वेंटिलेटर सहायता की आवश्यकता थी।
सिविल अस्पताल हिसार में उपलब्ध एकमात्र नवजात वेंटिलेटर पहले से इस्तेमाल में था, जिसके बाद बच्चे को महाराजा अग्रसेन मेडिकल कॉलेज, अग्रोहा रेफर किया गया।
खबरों के अनुसार, वहां भी वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होने के कारण बच्चे को पंडित बी. डी. शर्मा पीजीआईएमएस, रोहतक भेजा गया जहां परिवार को कथित तौर पर बताया गया कि सभी वेंटिलेटर पर मरीज हैं और तत्काल सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
इसके बाद माता-पिता बच्चे को वापस हिसार लेकर आए और एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां दो जुलाई को नवजात को मृत घोषित कर दिया गया।
आयोग ने सात जुलाई को जारी अपने आदेश में कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल एक नवजात की दुर्भाग्यपूर्ण मौत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आपातकालीन नवजात स्वास्थ्य सेवाओं, रेफरल व्यवस्था, महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों के रखरखाव और सरकारी अस्पतालों के बीच समन्वय में गंभीर खामियों की ओर संकेत करेगा।
आयोग ने कहा, ‘‘यदि रिपोर्ट में बताए गए तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह एक बच्चे से जुड़ी छुटपुट घटना से कहीं आगे का मामला है। यह सरकारी अस्पतालों में महत्वपूर्ण नवजात स्वास्थ्य ढांचे की उपलब्धता, रखरखाव और उपयोग में संभावित प्रणालीगत कमियों को दर्शाता है और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से इसकी सावधानीपूर्वक जांच आवश्यक है।’’
आयोग की पूर्ण पीठ ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, स्वास्थ्य सेवा विभाग और अन्य चिकित्सा अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। पूर्ण पीठ में अध्यक्ष न्यायमूर्ति ललित बत्रा, न्यायिक सदस्य कुलदीप जैन और सदस्य दीप भाटिया शामिल हैं।
आयोग ने इस बात पर भी चिंता जताई कि नवजात के पिता को जीवन रक्षक उपचार की तलाश में कथित तौर पर करीब 24 घंटे तक अलग-अलग सरकारी अस्पतालों में भटकना पड़ा।
आयोग ने कहा कि यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की गंभीर विफलता को दर्शाएगा।
आयोग ने कहा कि जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शामिल हिसार सिविल अस्पताल में कथित तौर पर केवल एक नवजात वेंटिलेटर था, जो उस समय उपयोग में था।
खबरों में यह भी दावा किया गया कि अस्पताल में उपलब्ध करीब 40 वेंटिलेटर में से लगभग 25 इस्तेमाल में नहीं थे, जबकि करीब 13 तकनीकी खराबी के कारण काम नहीं कर रहे थे।
कोविड-19 महामारी के दौरान उपलब्ध कराए गए कई वेंटिलेटर के रखरखाव और समय पर मरम्मत के अभाव में बेकार पड़े रहने के आरोपों को भी आयोग ने गंभीरता से लिया।
आयोग ने कहा कि किसी गंभीर मरीज, विशेषकर नवजात को रेफर करने से पहले रेफर करने वाले अस्पताल की जिम्मेदारी है कि वह संबंधित अस्पताल में आवश्यक चिकित्सा सुविधा की वास्तविक उपलब्धता की पुष्टि करे। बिना जांच के मरीज को रेफर करना आपातकालीन चिकित्सा सेवा के उद्देश्य को विफल करता है और मरीज के जीवन को अनावश्यक खतरे में डालता है।
आयोग ने राज्य में एकीकृत रियल-टाइम आपातकालीन रेफरल प्रणाली की तत्काल आवश्यकता पर भी जोर दिया।
आयोग ने कहा कि आधुनिक स्वास्थ्य प्रशासन में सरकारी अस्पतालों के बीच आईसीयू बेड, एनआईसीयू बेड, वेंटिलेटर और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता की वास्तविक समय में जानकारी साझा करना जरूरी है, ताकि गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजने में अनावश्यक देरी न हो।
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायमूर्ति ललित बत्रा की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने अधिकारियों से राज्य में आपातकालीन नवजात रेफरल और अस्पतालों के बीच समन्वय की मौजूदा नीति, सरकारी अस्पतालों में जिलेवार एनआईसीयू और नवजात वेंटिलेटर की उपलब्धता सहित कई बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी है।
आयोग ने घटना के बाद आपातकालीन नवजात देखभाल को मजबूत करने और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी मांगी है।
अधिकारियों से कोविड-19 के दौरान उपलब्ध कराए गए वेंटिलेटर सहित उपयोग में नहीं आने वाले, मरम्मत या खराब पड़े वेंटिलेटर का विवरण भी मांगा गया है।
आयोग ने यह भी पूछा है कि क्या पिछले दो वर्षों में वेंटिलेटर और अन्य महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों का राज्य स्तरीय ऑडिट किया गया है और सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं।
हरियाणा मानवाधिकार आयोग के सहायक रजिस्ट्रार डॉ. पुनीत अरोड़ा ने बताया कि आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को अगली सुनवाई की तारीख एक सितंबर से कम से कम एक सप्ताह पहले विस्तृत रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है।
भाषा
मनीषा नरेश
नरेश

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