नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करने में विफल रहने पर बुधवार को दिल्ली सरकार से अप्रसन्नता व्यक्त की। सरकार ने अप्रैल के मध्य तक इन खाली पदों को भरने का आश्वासन दिया था।
सरकार की ‘उदासीनता’ पर नाखुशी जताते हुए मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि अधिकारी तीन साल से रिक्तियां होने के बावजूद आयोग को क्रियाशील बनाने के अपने ही बयानों का ‘सम्मान’ नहीं कर रहे हैं।
फरवरी में दिल्ली सरकार ने एक हलफनामा दायर कर कहा था कि अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक समाप्त होने की संभावना है।
पीठ ने टिप्पणी की, ‘इस तरह की उदासीनता हमें कहीं और देखने को नहीं मिलती। अगर यह जानबूझकर किया जा रहा है, तो यह और भी खतरनाक है। तीन साल से यह आयोग निष्क्रिय पड़ा है। इस आयोग के कार्यों को देखिए।’
अदालत ने कहा कि डीसीपीसीआर की स्थापना एक अधिनियम के माध्यम से की गई थी, न कि अदालत के आदेश से और अधिकारी विधायिका के आदेश का भी पालन नहीं कर रहे हैं।
पीठ ने कहा, ‘कानून बनाते समय आप ढोल पीटते हैं। किशोर न्याय अधिनियम कब लागू हुआ था? ग्यारह साल हो गए और हम अब भी इसे लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आप बाल कल्याण समिति नहीं बनाएंगे। आपके पास चयन समिति नहीं होगी।’
दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि उनके पास इसके लिए ‘कोई बहाना नहीं’ है। उन्होंने नियुक्तियां करने के लिए छह सप्ताह का और समय मांगा।
उन्होंने बताया कि फाइल अंतिम निर्णय के लिए ‘उच्चतम प्राधिकारी’ के पास लंबित है और प्रक्रिया पूरी करने के लिहाज से समय बढ़ाने के लिए एक औपचारिक आवेदन भी दायर किया गया है।
अदालत ने सुनवाई की तारीख तीन जुलाई से 22 मई कर दी।
भाषा सुमित वैभव
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