जयपुर, 18 जनवरी (भाषा) राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने लोकतंत्र को कुचलने के विपक्ष के आरोप को खारिज करते हुए रविवार को कहा कि लंबे समय से लागू प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देशों को लेकर “झूठा विमर्श” गढ़ा जा रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया कि नए दिशा-निर्देश विधायकों के अधिकारों और संसदीय लोकतंत्र के क्षरण के बराबर है।
गहलोत की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने रविवार को यहां आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वह पूर्व मुख्यमंत्री का सम्मान करते हैं, लेकिन लगता है कि सत्र पूर्व जारी बुलेटिन को ध्यान से नहीं पढ़ा गया।
देवनानी ने कहा, “लोकतंत्र की हत्या जैसे आरोप गंभीर हैं। लोकतंत्र कैसे क्षतिग्रस्त होता है, यह गहलोत को बेहतर पता होगा।”
गहलोत ने सोशल मीडिया पर जारी बयान में दिशा-निर्देशों को दुर्भाग्यपूर्ण और संसदीय लोकतंत्र की भावना के विपरीत बताया।
उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा कि एक विधायक केवल अपने क्षेत्र का नहीं बल्कि पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व करता है और उसे राज्य स्तर के नीतिगत विषयों या पांच साल पुराने मामलों पर प्रश्न पूछने से रोकना और मंत्रियों को जवाबदेही से ‘छूट’ देना, सदन की गरिमा को कम करने जैसा है।
गहलोत ने कहा, “लोकतंत्र में विपक्ष और विधायकों का काम सरकार की जवाबदेही तय करना है। यदि प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता ही नहीं रहेगी, तो विधानसभा का औचित्य क्या रह जाएगा। विधायिका का काम कार्यपालिका पर अंकुश रखना है, न कि कार्यपालिका की सुविधा अनुसार अपने अधिकार कम करना।”
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि ऐसा आदेश संभवतः देश में पहली बार जारी किया जा रहा है, जिसमें विधायकों के अधिकारों को कम किया जा रहा है।
गहलोत ने कहा कि अन्य विधानसभाएं अपने सदस्यों के अधिकार बढ़ाने का प्रयास करती हैं, लेकिन यहां इसके विपरीत देखने को मिल रहा है।
उन्होंने कहा, “विधायकों को राज्य स्तर के सवाल पूछने से रोकना और मंत्रियों को जवाबदेही से मुक्त करना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। ऐसे आदेश को अविलंब वापस लेना चाहिए।”
इन दावों का खंडन करते हुए देवनानी ने स्पष्ट किया कि जिस बुलेटिन पर सवाल उठाया जा रहा है, वह नया नहीं है। उन्होंने 2020 के बुलेटिन संख्या 26 का हवाला दिया, जिसमें ऐसे ही प्रावधान थे।
देवनानी ने कहा, “यदि ये निर्देश 2020 से लागू हैं तो 2026 में इसे मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?”
उन्होंने यह भी बताया कि उस समय टीकाराम जूली कैबिनेट मंत्री थे और उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई थी। जूली अब विपक्ष के नेता
दिशा-निर्देशों में प्रयुक्त शब्द “तुच्छ” को लेकर उठी आपत्तियों पर देवनानी ने कहा कि यह शब्द लोकसभा नियमावली और अन्य विधानसभाओं से लिया गया है।
उन्होंने बताया कि यह शब्द 1952 से लोकसभा के दिशा-निर्देशों में और 1956 से कई राज्य विधानसभाओं में प्रयुक्त होता रहा है। देवनानी ने कहा कि प्रक्रियात्मक नियम बनाने का पूरा अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है।
अध्यक्ष ने यह भी कहा की कि 27 जनवरी को उनके कक्ष में सर्वदलीय बैठक होगी। उन्होंने सभी दलों से इसमें शामिल होकर सुझाव देने की अपील की, ताकि सदन का सुचारू संचालन सुनिश्चित किया जा सके।
भाषा बाकोलिया नोमान
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