नयी दिल्ली, 29 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय में बुधवार को केरल के शबरिमला मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान रामायण की शबरी कथा का जिक्र किया गया।
इन याचिकाओं पर नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है, जिनमें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति एहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।
पीठ जैसे ही आज की सुनवाई समाप्त करने वाली थी, 2018 के फैसले के बाद शबरिमला मंदिर में प्रवेश करने वाली दो महिलाओं (बिंदू अमिनी और कनकदुर्गा) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने उसके समक्ष शबरी का उल्लेख किया, जो रामायण में राम के प्रति निस्वार्थ भक्ति भाव रखने वाली एक बुजुर्ग आदिवासी महिला थीं।
जयसिंह ने कहा, “शबरी कौन थीं? आप सभी ने रामायण पढ़ी है। वह एक महिला थीं, जिन्होंने भगवान राम को बेर अर्पित किए थे।”
उन्होंने कहा कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, शबरी कहती हैं, “मैं जीवन भर भगवान राम से मिलने की प्रतीक्षा करती रही। यह मेरी इच्छा थी, मेरी अंतरात्मा की इच्छा। फिर मैंने सुना कि वह शबरिमलाई आ रहे हैं।”
जयसिंह ने कहा, “और शबरिमलाई क्या था? मलाई का अर्थ है, एक पहाड़ी, पहाड़ियों पर रहने वाले व्यक्ति; आदिवासी पहाड़ियों पर रहते हैं; यह उनका मूल निवास स्थान है।”
उन्होंने कहा, “वह (शबरी) कहती हैं, आखिरकार मेरा सपना साकार हो रहा है, मुझे भगवान राम से मिलने का मौका मिलेगा।”
जयसिंह ने कहा, “शबरी ने सोचा कि वह भगवान राम को क्या भेंट करेंगी, क्योंकि उनके पास धन नहीं है। उन्होंने कहा कि वह उन्हें बेर भेंट करेंगी। फिर उन्होंने सोचा कि अगर बेर कड़वे निकले, तो क्या होगा। इसके बाद उन्होंने फैसला किया कि वह बेर चखेंगी और उनमें से जो कड़वे होंगे, उन्हें अलग कर देंगी।”
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “शबरी ने भगवान राम को सिर्फ मीठे बेर ही भेंट करने का फैसला किया। जब राम आए, तो शबरी ने उन्हें बेर भेंट किए। राम के भाई लक्ष्मण ने उनसे पूछा, आप ये क्या कर रहे हैं, आप इन्हें कैसे खा सकते हैं, जबकि वह (शबरी) पहले ही इन्हें चख चुकी हैं?”
जयसिंह ने कहा, “जवाब में राम ने कहा कि मैं उनकी आस्था का सम्मान कर रहा हूं, मैं उनका आदर कर रहा हूं और यह प्रेम भाव है।”
उन्होंने दलील दी, “और आप मुझे शबरिमला में प्रवेश करने से रोक रहे हैं, मैं भी तो एक शबरी हूं।”
जयसिंह की दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए न्यायमूर्ति कुमार ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, “शबरी की उम्र 50 साल से अधिक थी।”
वर्ष 1991 से 2018 तक 10 से 50 साल की उम्र की लड़कियों एवं महिलाओं के लिए शबरिमला मंदिर में प्रवेश करने पर प्रतिबंध था।
सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से पारित फैसले में इस प्रतिबंध को हटा दिया। पीठ ने कहा कि सदियों पुरानी यह धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक थी।
इसके बाद 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय अन्य संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से पारित फैसले में विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
शीर्ष अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर विचार के लिए सात प्रश्न निर्धारित किए थे।
न्यायालय ने कहा था कि पहले प्रश्न के तहत वह इस बात पर विचार करेगा कि “भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा क्या है?”
उसने कहा था कि दूसरा प्रश्न यह है कि “संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच क्या परस्पर संबंध है?”
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि तीसरा प्रश्न यह है कि क्या अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अलावा अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
उसने कहा था कि चौथा प्रश्न यह है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा क्या है और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता शामिल है?
न्यायालय ने कहा था कि पांचवें प्रश्न के तहत वह अनुच्छेद 25 में संदर्भित धार्मिक प्रथा के संबंध में “न्यायिक समीक्षा के दायरे” पर विचार करेगा।
उसने कहा था, “छठवां प्रश्न यह है कि संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (ख) में प्रयुक्त “हिंदुओं के वर्ग” का क्या अर्थ है?”
शीर्ष अदालत ने कहा था कि सातवें प्रश्न के तहत वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका दायर करके उस “धार्मिक संप्रदाय या धार्मिक समूह” की किसी प्रथा पर सवाल उठा सकता है।
भाषा पारुल पवनेश
पवनेश