बिना मुकदमे के कारावास सजा के समान: उच्चतम न्यायालय

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बिना मुकदमे के कारावास सजा के समान: उच्चतम न्यायालय

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  • Publish Date - March 29, 2026 / 05:02 PM IST,
    Updated On - March 29, 2026 / 05:02 PM IST

नयी दिल्ली, 29 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बिना मुकदमे के कारावास को सजा के समान बताते हुए हत्या के प्रयास के मामले में पंजाब के एक व्यक्ति को जमानत दे दी। अदालत ने यह भी कहा कि व्यक्ति दो साल से जेल में है, जबकि मुकदमे की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई है।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति पी वी वराले की पीठ ने अपने हालिया आदेश में कहा कि प्रदीप कुमार उर्फ ​​बानू के खिलाफ फरवरी 2024 में हत्या के प्रयास सहित विभिन्न अपराधों के लिए मामला दर्ज किया गया था, लेकिन अभियोजन पक्ष ने अभी तक मामले से संबंधित 23 गवाहों में से किसी से भी कोई सवाल-जवाब नहीं किए हैं।

पीठ ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 11 जुलाई, 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कुमार की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

इसने 13 मार्च के अपने आदेश में कहा, ‘‘अभियोजन पक्ष ने अपीलकर्ता के खिलाफ आरोपों को साबित करने के लिए मामले से संबंधित 23 गवाहों में से किसी से भी सवाल-जवाब नहीं किए हैं। इसलिए, मुकदमे को पूरा होने में कुछ समय लग सकता है।’’

न्यायालय ने कहा कि कुमार की गिरफ्तारी को लगभग दो साल बीत चुके हैं, लेकिन न तो मुकदमा शुरू हुआ है और न ही इसके नतीजे आने की कोई उम्मीद है। शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ‘‘बिना मुकदमे के कारावास सजा के समान है।’’

मामले का समग्र रूप से अवलोकन करते हुए, न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुकदमे की सुनवाई तक अपीलकर्ता को आगे हिरासत में रखना आवश्यक नहीं है; और, चूंकि अपील स्वीकार करने योग्य है, इसलिए अपीलकर्ता को जमानत दी जा सकती है।

पीठ ने उसे निचली अदालत की संतुष्टि के अनुरूप जमानत बॉण्ड प्रस्तुत करने और अन्य नियम-शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी गवाह को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा।

शीर्ष न्यायालय ने अपील को स्वीकार करते हुए कुमार को निर्देश दिया कि वह मुकदमे की कार्यवाही में नियमित रूप से उपस्थित रहेगा जब तक कि उसे छूट ना दी जाए।

भाषा आशीष नेत्रपाल

नेत्रपाल