रायपुरः Vishnu Ka Sushasan छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब केवल सुरक्षा अभियानों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पुनर्वास और विकास के जरिए स्थायी समाधान की दिशा में बढ़ रही है। विष्णु देव साय सरकार के दो साल के कार्यकाल में यह बदलाव साफ नजर आ रहा है, जहां ‘हिंसा से हुनर’ की ओर लौटते आत्मसमर्पित माओवादी नई जिंदगी की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। दरअसल, छत्तीसगढ़ लंबे समय तक देश में नक्सलवाद का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता रहा है। बस्तर के घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और सीमावर्ती इलाके नक्सली गतिविधियों के लिए अनुकूल रहे, जहां वर्षों तक हिंसा, भय और असुरक्षा का माहौल बना रहा। लेकिन छत्तीसगढ़ साय सरकार के प्रयासों से अब हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं।
नक्सलवाद को सरकार ने एक बड़ी चुनौती की तरह लिया। छत्तीसगढ़ सरकार ने मार्च 2026 तक राज्य को नक्सलमुक्त बनाने के उद्देश्य से ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण, पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025’ लागू की। इस नीति के तहत, हिंसा का मार्ग छोड़ मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों को नकद प्रोत्साहन (₹5 लाख तक), आवास, भूमि, शिक्षा, कौशल विकास और सुरक्षा प्रदान की जाती है। साय सरकार की इस नीति का सकरात्मक असर भी देखने को मिला। केंद्र सरकार और राज्य सरकार के समेकित प्रयास से बीतें ढ़ाई साल में 3000 से ज्यादा माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया। वहीं 200 से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार हुए हैं। इसके अलावा 500 से ज्यादा नक्सली मारे गए हैं।
जिन हाथों ने कभी बंदूक थामकर हिंसा की राह अख्तियार किया था, आज उन्हीं हाथों को राज्य की नक्सल पुनर्वास नीति के तहत कुशल और दक्ष बनाने की कवायद जिला प्रशासन द्वारा की जा रही है। शासन की मंशानुसार ग्राम चौगेल (मुल्ला) कैंप में प्रशिक्षण देकर ’हिंसा से हुनर’ की ओर लौटे माओवादियों को नया जीवनदान मिल रहा है। कभी माओवाद गतिविधियों में संलिप्त रहे युवक-युवतियों को अब ड्राइविंग, सिलाई, काष्ठशिल्प कला, सहायक इलेक्ट्रिशियन जैसे विभिन्न ट्रेड में सतत् प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे वे समाज की मुख्य धारा में लौटने के बाद आजीविका मूलक गतिविधियों में कुशल होकर बेहतर ढंग से सम्मान पूर्वक जीवन निर्वाह कर सके।
बस्तर संभाग में एक समय बंदूक थामे जंगलों में खून-खराबा करने वाले पूर्व नक्सली आज हुनरमंद बनकर नई जिंदगी जी रहे हैं। सरेंडर के बाद ये लोग आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में सरकार द्वारा संचालित विशेष प्रशिक्षण शिविरों में कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन शिविरों में प्रशिक्षण ले रहे लोग अपने अतीत पर पछतावा जताते हुए वर्तमान से संतुष्ट नजर आते हैं। पूर्व पीएलजीए सदस्य सुकराम बताते हैं, “मैं पहले दूसरे राज्य में मजदूरी करता था। नक्सलियों ने मेरे परिवार को परेशान किया, जिसके चलते मजबूरी और जोश में मैं संगठन में शामिल हो गया। खून-खराबा किया, लेकिन बाद में समझ आया कि यह गलत है। मैंने सरेंडर किया और अब राजमिस्त्री का प्रशिक्षण ले रहा हूं।” सुकराम जैसे कई युवा परिवार की सुरक्षा और अन्य मजबूरियों के चलते नक्सलवाद में शामिल हुए थे, जो अब इन शिविरों में नई राह तलाश रहे हैं।
सरकार इन पूर्व नक्सलियों को उनकी रुचि के अनुसार ट्रेड सिखा रही है, ताकि उन्हें भविष्य में आसानी से रोजगार मिल सके। आइटीआइ और लाइवलीहुड मिशन के तहत राजमिस्त्री, खेती-किसानी, पशुपालन, मछली पालन जैसे कौशल सिखाए जा रहे हैं। प्रशिक्षण के साथ-साथ एक्सपोजर विजिट भी करवाई जा रही हैं, जहां ये लोग विभिन्न जिलों के संस्थानों में जाकर व्यवसायों को करीब से समझ रहे हैं।
बस्तर, खासकर बीजापुर, एक समय नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था। अब सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए सरकार विशेष प्रयास कर रही है, ताकि वे बेरोजगारी के कारण दोबारा उसी दलदल में न लौटें। इन शिविरों में ऐसे पूर्व नक्सली भी शामिल हैं, जो कभी बम बनाने और हथियार चलाने जैसे कामों में लिप्त थे। अब वे खेती, पशुपालन और अन्य रोजगारपरक कौशल सीख रहे हैं। प्रशिक्षण ले रहे पूर्व नक्सलियों का कहना है कि बंदूक छोड़ने के बाद उनकी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आया है।
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