क्या राज्य में पदस्थापना के लिए आईपीएस अधिकारी की सहमति आवश्यक है: न्यायालय ने पूछा

क्या राज्य में पदस्थापना के लिए आईपीएस अधिकारी की सहमति आवश्यक है: न्यायालय ने पूछा

क्या राज्य में पदस्थापना के लिए आईपीएस अधिकारी की सहमति आवश्यक है: न्यायालय ने पूछा
Modified Date: January 9, 2023 / 08:32 pm IST
Published Date: January 9, 2023 8:32 pm IST

नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को गृह मंत्रालय से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात किसी आईपीएस अधिकारी को किसी राज्य का पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) नियुक्त करने से पहले उसकी सहमति जरूरी है।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिंह की पीठ ने गृह मंत्रालय को एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के लिए कहा। इसने कहा कि संबंधित पदस्थापना के लिए यदि सहमति आवश्यक होती हो, तो संबंधित नियमों को निर्दिष्ट किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘‘गृह मंत्रालय एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करेगा जिसमें यह बताया जाएगा कि क्या किसी अधिकारी की डीजीपी के रूप में नियुक्ति के लिए उसकी सहमति आवश्यक होती है, भले ही वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हो।’’

शीर्ष अदालत 1991 बैच के आईपीएस अधिकारी टी जे लोंगकुमेर की नगालैंड के डीजीपी के रूप में नियुक्ति पर अपने पहले के निर्देशों को लागू करने से संबंधित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। लोंगकुमेर ने इस महीने की शुरुआत में पद से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि उन्होंने शीर्ष अदालत द्वारा प्रकाश सिंह मामले में निर्धारित किए गए मानदंडों को कथित तौर पर पूरा नहीं किया था।

याचिका ‘नगालैंड लॉ स्टूडेंट्स फेडरेशन’ द्वारा दायर की गई थी, जिसमें लोंगकुमेर को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद विस्तार देने के आदेश को वापस लेने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था।

पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से उस पत्र को रिकॉर्ड पर रखने के लिए भी कहा, जिसके द्वारा उसने पिछले साल 15 दिसंबर को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के पत्र पर नगालैंड के डीजीपी के रूप में नियुक्ति के लिए अनुभव मानदंड को 30 साल से कम करके 25 साल करने की सहमति दी थी।

इसने यूपीएससी को 15 दिसंबर के संचार के संबंध में उठाए गए कदमों के बारे में एक हलफनामा दायर करने के लिए भी कहा।

सुनवाई के दौरान पीठ को बताया गया कि यूपीएससी ने 15 दिसंबर, 2022 को एक पत्र भेजा था, जिसमें डीजीपी पद के लिए सिर्फ एक नाम की सिफारिश की गई थी।

शीर्ष अदालत ने नगालैंड के वकील की इस दलील पर गौर किया कि विदेशों में तैनाती के लिए अधिकारियों की सहमति ली जाती है, लेकिन राज्य संवर्ग में नियुक्ति के लिए नहीं।

नगालैंड में, मूल रूप से छत्तीसगढ़ कैडर के लोंगकुमेर अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी डीजीपी के पद पर बने हुए थे।

लोंगकुमेर को 27 जून, 2018 को डीजीपी के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्हें 31 अगस्त, 2022 तक एक साल का विस्तार दिया गया था। उन्हें फिर से फरवरी 2023 तक छह महीने का विस्तार दिया गया था।

हालांकि, उन्होंने इस महीने की शुरुआत में इस्तीफा दे दिया और पद के लिए अनुशंसित एकमात्र अधिकारी रूपिन शर्मा की डीजीपी के रूप में नियुक्ति हुई।

शीर्ष अदालत ने 17 अक्टूबर को लोंगकुमेर की सेवानिवृत्ति के बाद उनका कार्यकाल बढ़ाने के लिए नगालैंड सरकार को फटकार लगाई थी और नए पुलिस प्रमुख की नियुक्ति के लिए राज्य कैडर से यूपीएससी को योग्य आईपीएस अधिकारियों के नामों का नया पैनल भेजने को कहा था।

इसने इस तथ्य को भी गंभीरता से लिया था कि लोंगकुमेर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य पुलिस स्थापना बोर्ड की बैठक का हिस्सा थे, जिसने छह महीने की अवधि के लिए उनके विस्तार की सिफारिश की थी।

भाषा नेत्रपाल माधव

माधव


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