जम्मू-कश्मीर सरकार 1953 में पुलिस थाने के लिए जबरन अधिग्रहीत जमीन के लिए मुआवजा दे: न्यायालय

Ads

जम्मू-कश्मीर सरकार 1953 में पुलिस थाने के लिए जबरन अधिग्रहीत जमीन के लिए मुआवजा दे: न्यायालय

  •  
  • Publish Date - August 17, 2026 / 07:12 PM IST,
    Updated On - August 17, 2026 / 07:12 PM IST

नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को सोमवार को आदेश दिया कि वह उन किसानों के वंशज को मुआवज़ा और किराया दे, जिनकी जमीन गांदरबल के कंगन में पुलिस थाना बनाने के लिए करीब 73 साल पहले बिना किसी अधिग्रहण प्रक्रिया के जबरन ले ली गई थी।

कंगन में पुलिस थाना बनाने के लिए 1953 में सात कनाल और 18 मरला जमीन जबरन सरकार द्वारा ली गई थी और जमीन के मालिक को मुआवजा भी नहीं दिया गया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने अब्दुल रशीद वानी की याचिका पर संज्ञान लिया। वानी ने वकील महफ़ूज़ अहसान नाजकी के जरिए उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिका में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के 2022 के फैसले को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने 1953 में गांदरबल जिले में पुलिस थाने के लिए ली गई जमीन का कब्जा पाने के लिए दायर रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस दावे में 68 साल की बहुत अधिक और बिना किसी वजह के देरी हुई है।

न्यायालय ने सोमवार को वानी की पुख्ता दलीलों पर संज्ञान लिया कि भले ही देरी हुई थी, लेकिन राज्य की गैर-कानूनी कार्रवाई की वजह से उन्हें नुकसान नहीं होना चाहिए।

शीर्ष न्यायालय ने कहा कि लगभग सात दशकों की देरी के कारण वह अभी ज़मीन अधिग्रहण की नई प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश नहीं दे सकता।

पीठ ने हालांकि कहा कि वह भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश देगी कि वे उस तारीख से इस प्रक्रिया की शुरुआत करें, जब वानी ने 2021 में उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था।

पीठ ने वानी की सहायता की मंशा से भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया कि वह 1953 से याचिकाकर्ता को किराए का हिसाब करके उसका भुगतान करें क्योंकि उसी साल जमीन को जबरन थाना बनाने के लिए सरकार द्वारा अधिग्रहीत किया गया था।

पीठ ने कहा कि भूमि अधिग्रहण और किराए की रकम का फैसला उच्च न्यायालय करेगा।

भाषा धीरज नरेश

नरेश