तिरुवनंतपुरम, 15 मार्च (भाषा) केरल में नौ अप्रैल को विधानसभा की 140 सीटों के लिए एक ही चरण में मतदान होना है। ऐसे में राजनीतिक दल हाल के वर्षों में प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने वाले कई मुद्दों के साथ मतदाताओं के बीच जाने की तैयारी कर रहे हैं।
सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के अपने शासन के कामकाज को प्रमुखता से उठाने की संभावना है, जबकि विपक्षी कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) एलडीएफ सरकार को कई विवादित मुद्दों पर घेर सकते हैं।
चुनाव प्रचार में एक बार फिर शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का संवेदनशील मुद्दा उठने की संभावना है। राज्य सरकार ने पहले उच्चतम न्यायालय के उस फैसले का समर्थन किया था, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। हालांकि, बाद में सरकार के रुख में नरमी आने पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले धार्मिक भावनाओं को संतुलित करने के लिए ऐसा किया गया है।
इसी के साथ प्रमुख राजनीतिक दलों के भीतर असंतुष्ट नेताओं और बागियों की मौजूदगी भी कई सीटों पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है, क्योंकि स्थानीय गुटों के समर्थन वाले निर्दलीय उम्मीदवार पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
राज्य के वन क्षेत्रों से सटे इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में जंगली हाथियों, जंगली सूअरों और अन्य जानवरों के हमलों में कई लोगों की मौत हुई है, जबकि किसानों ने फसलों को भारी नुकसान की शिकायत की है। किसान संगठन जल्द मुआवजा दिए जाने और मजबूत रोकथाम उपायों की मांग कर रहे हैं, जिससे यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।
कृषि क्षेत्र में व्यापक संकट, बढ़ती लागत और कुछ क्षेत्रों में घटते मुनाफे भी चुनावी बहस में प्रमुखता से उठने की उम्मीद है।
सत्तारूढ़ एलडीएफ अपने कार्यकाल के दौरान सड़क विकास, सार्वजनिक परिवहन में सुधार, बंदरगाह और तटीय परियोजनाओं सहित बुनियादी ढांचे के विकास को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकता है। इसके साथ ही बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए पेंशन तथा वित्तीय सहायता जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं को भी प्रमुखता दी जाएगी।
हालांकि, विपक्ष ने पेंशन वितरण में देरी का मुद्दा उठाते हुए कहा है कि वित्तीय संकट के कारण राज्य की इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ा है।
राष्ट्रीय स्तर पर सराहना पाने वाली राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, हाल के वर्षों में कथित चिकित्सकीय लापरवाही की घटनाओं के बाद आलोचना के घेरे में भी आई है। यूडीएफ और राजग इन मामलों को उठाकर स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की भूमिका पर सवाल उठा सकते हैं।
कानून-व्यवस्था भी एक प्रमुख चुनावी मुद्दा है, जिस पर सरकार को विपक्ष के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। विपक्ष ने हिंसा की घटनाओं और कुछ मामलों में पुलिस हिरासत में कथित यातना के आरोपों को लेकर सरकार की आलोचना की है।
चुनाव प्रचार के दौरान वैचारिक और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज हो सकता है। माकपा और भाजपा, कांग्रेस तथा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कुछ वर्गों की जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामिक संगठनों से कथित नजदीकी होने का मुद्दा उठा सकते हैं।
इसके अलावा राज्य से बाहर की राजनीतिक घटनाओं का भी असर चुनावी बहस पर पड़ सकता है। वामपंथी दल यह मुद्दा उठा सकते हैं कि अन्य राज्यों में कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हुए हैं, जिसका अल्पसंख्यक वोटों पर प्रभाव पड़ सकता है।
राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे भी चुनावी प्रचार को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें नागरिकता संशोधन अधिनियम, प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक पंजी और नागरिकता से जुड़े अन्य नीतिगत मुद्दे शामिल हैं, जिन पर केरल के राजनीतिक दल पहले भी मजबूत रुख अपनाते रहे हैं।
एलडीएफ केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए श्रम कानूनों को भी मुद्दा बना सकता है, जिनके बारे में उसका कहना है कि इससे श्रमिकों के अधिकार कमजोर हो सकते हैं।
भाषा रवि कांत नेत्रपाल
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