नैनीताल, 16 जुलाई (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कहा है कि वैज्ञानिक सबूतों के अभाव में केवल शराब की गंध आने के आधार पर नशे में गाड़ी चलाने का आरोप या भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-105 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत अपराध साबित नहीं होता।
अदालत ने कहा कि खून की जांच या ‘ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट’ के जरिये यह साबित किया जना चाहिए चाहिए कि किसी व्यक्ति के शरीर में अल्कोहल का स्तर मोटर यान अधिनियम-1988 के तहत तय सीमा से ज्यादा था।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने बुधवार को एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता पर बीएनएस की 105 (गैर-इरादतन हत्या), 125(ए) (किसी व्यक्ति के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले लापरवाही भरे कृत्य), 125(बी) (लापरवाही के कारण दूसरों की जान या सुरक्षा को खतरे में डालना) और 281 (सार्वजनिक मार्गों पर लापरवाही और खतरनाक तरीके से वाहन चलाना) के तहत आरोप तय किए गए थे।
याचिकाकर्ता अमर सिंह बदरीनाथ धाम से चमोली की ओर जा रही जीप चला रहा था, जिसमें कई यात्री सवार थे। रास्ते में जीप अनियंत्रित होकर पलट गई, जिससे उसमें सवार एक यात्री की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।
हादसे के बाद मेडिकल जांच में सिंह की सांस से शराब की गंध आने की बात सामने आई। हालांकि, न तो उसका खून का नमूना लिया गया और न ही ‘ब्रेथ एनालाइज़र टेस्ट’ किया गया।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मोटर यान अधिनियम की धारा-185 के तहत किसी व्यक्ति को नशे में गाड़ी चलाने का दोषी तभी ठहराया जा सकता है, जब कोई वैज्ञानिक परीक्षण यह साबित करे कि उसके खून में अल्कोहल की मात्रा 30 मिलीग्राम प्रति 100 मिलीलीटर रक्त से अधिक थी।
यह भी दलील दी गई कि हादसा चालक की लापरवाही से नहीं, बल्कि जीप में खराबी के कारण हुआ था, जिसमें वाहन का अगला टायर फंटने से उसका संतुलन बिगड़ गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही मेडिकल रिपोर्ट में चालक की सांस से शराब की गंध आने का जिक्र है, लेकिन अभियोजन पक्ष कानून के तहत निर्धारित नशे की स्थिति को साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक सबूत पेश करने में नाकाम रहा है।
अदालत ने माना कि जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री बीएनएस की धारा-105 के तहत आरोप तय करने के लिए जरूरी शर्तों को पहली नजर में पूरी नहीं करती है। हालांकि, उसने कहा कि आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 125(ए), 125(बी) और 281 के तहत तय किए गए आरोप बरकरार रहेंगे।
भाषा
सं दीप्ति पारुल
पारुल