निकोबार मामले में मोदी सरकार ने हैरान करने वाला ‘यू-टर्न’ लिया, सुनवाई रोकने की कोशिश की: कांग्रेस

निकोबार मामले में मोदी सरकार ने हैरान करने वाला 'यू-टर्न' लिया, सुनवाई रोकने की कोशिश की: कांग्रेस

निकोबार मामले में मोदी सरकार ने हैरान करने वाला ‘यू-टर्न’ लिया, सुनवाई रोकने की कोशिश की: कांग्रेस
Modified Date: September 30, 2026 / 10:50 am IST
Published Date: September 30, 2026 10:50 am IST

नयी दिल्ली, 30 सितंबर (भाषा) कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने हैरान करने वाला ‘यू-टर्न’ लेते हुए ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना से जुड़ी याचिकाओं पर कलकत्ता उच्च न्यायालय में सुनवाई रोकने के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है और वहां फिर से याचिकाकर्ता के अदालत जाने के अधिकार पर सवाल उठाया है।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि ग्रेट निकोबार परियोजना के संबंध में कलकत्ता उच्च न्यायालय में पांच याचिकाएं लंबित हैं और इनमें से एक याचिका में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कथित उल्लंघन और स्थानीय जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। इस मामले में 25 और 26 नवंबर, 2026 को अंतिम सुनवाई निर्धारित है।

रमेश के मुताबिक, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के रूप में पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह मीना गुप्ता के अधिकार को बरकरार रखा था।

उन्होंने कहा कि अब केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में कलकत्ता उच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने का अनुरोध किया है।

रमेश ने कहा कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मई में यह मानने से इनकार कर दिया था कि गुप्ता को याचिका दायर करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने माना था कि उनका मामले में पर्याप्त हित है और वह कमजोर जनजातीय समुदाय के हितों का मुद्दा उठा रही हैं।

कांग्रेस नेता ने दावा किया कि पांचों याचिकाओं में परियोजना के लिए पर्यावरणीय और अन्य वैधानिक मंजूरियों तथा प्रक्रियाओं को चुनौती दी गई है।

रमेश ने कहा कि करीब 92,000 करोड़ रुपये की यह परियोजना पहले अनुमानित 72,000 करोड़ रुपये की लागत से बढ़ चुकी है। उन्होंने परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और अन्य रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए और आरोप लगाया कि सरकार अदालती मामलों के लंबित रहने के बावजूद परियोजना को आगे बढ़ा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि वह इस मुद्दे पर विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के साथ लगातार संवाद करते रहे हैं और उन्होंने परियोजना से जुड़े अपने पत्राचार एवं अन्य सार्वजनिक हस्तक्षेपों को साझा किया है।

रमेश ने इससे पहले भी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों और अनुपालन रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने का मुद्दा उठाया था।

भाषा हक

वैभव

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