नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) नियमों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में वर्षों बिताने वाले एक सरकारी अधिकारी जब खुद सीबीआई द्वारा जाल बिछाकर की गई कार्रवाई के एक मामले में फंस गए तो उन्हें इस जाल से निकलने के लिए 13 साल तक संघर्ष करना पड़ा। इसी संघर्ष को पूर्व अधिकारी ने एक किताब की शक्ल में दुनिया के सामने पेश किया है।
अतिरिक्त केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त पंकज द्वारा लिखित किताब ‘माई लेडी इन ब्लैक’ एक ऐसे निडर अधिकारी की निजी अनुभव गाथा है जो फैक्टरी कर्मचारियों, बुनकरों और दिहाड़ी मजदूरों को न्याय दिलाने के अपने प्रयासों में स्वयं व्यवस्था के निशाने पर आ जाते हैं।
किताब का विमोचन हाल में यहां ‘इंडिया हैबिटेट सेंटर’ में हुआ।
यह किताब कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में प्रवर्तन अधिकारी के रूप में काम करने से लेकर सीबीआई मामले में आरोपी बनने और अंततः 2019 में विशेष अदालत से बरी होने तक की कहानी है।
पंकज कहते हैं, ‘‘किसी सरकारी अधिकारी पर लगाया गया आरोप न केवल उसके करियर, बल्कि उसके परिवार और निजी जीवन को भी प्रभावित कर सकता है, भले ही मामले का अंतिम नतीजा बरी होने के रूप में सामने आए।’’
चेन्नई स्थित ‘पेनमानुष’ द्वारा प्रकाशित 382 पृष्ठों की इस पुस्तक में लंबे समय तक चले अभियोजन संबंधी मामले से जुड़े कानूनी और प्रक्रियागत मुद्दों को भी उठाया गया है।
बिहार, पूर्वोत्तर, झारखंड और उत्तर प्रदेश में अपनी तैनाती के दौरान पंकज ने कारखाना श्रमिकों, दिहाड़ी मजदूरों, बुनकरों और अन्य कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि संबंधी कानूनों को लागू कराने का काम किया।
उनका कहना था कि जिन कुछ प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की गई, वे प्रभावशाली थे और उनसे निपटना आसान नहीं था।
वर्ष 2005 में वाराणसी में तैनाती ने पंकज को कालीन उद्योग में शोषण के उन मामलों से रूबरू कराया, जिन्हें वह सबसे गंभीर मामलों में से एक बताते हैं।
बाद में उनका तबादला जमशेदपुर कर दिया गया। 28 दिसंबर, 2005 को जमशेदपुर में कार्यभार संभालने के बाद उनका सामना भविष्य निधि के बकाये से जुड़े एक मामले में एक ‘‘प्रभावशाली’’ व्यक्ति से हुआ।
वह व्यक्ति आईआईटी-आईआईएम का पूर्व छात्र था और प्रबंधन शिक्षा से जुड़ा था। वह विभिन्न प्रबंधन संस्थानों में अतिथि संकाय सदस्य/व्याख्याता भी रह चुका था।
पुस्तक के अनुसार, वह भविष्य निधि का बकायेदार भी था और बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद उसने अपने कर्मचारियों से संबंधित वैधानिक बकाया राशि जमा नहीं की थी।
यह मामला उस समय असामान्य मोड़ पर पहुंच गया जब नियोक्ता ईपीएफओ कार्यालय पहुंचा। तत्कालीन आयुक्त पंकज ने उस व्यक्ति को कार्यालय के एक कमरे में बनाए गए सिविल जेल में निरुद्ध कर दिया। यह आपराधिक गिरफ्तारी नहीं थी, बल्कि वैधानिक बकाये की वसूली के लिए भविष्य निधि कानून के प्रावधानों के तहत की गई कार्रवाई थी। बकाये का भुगतान कर दिया गया और भुगतान किए जाने के बाद ही उन्हें सिविल जेल से रिहा किया गया।
लेकिन, कुछ ही महीनों के भीतर पंकज खुद आरोपी बन गए। 22 जून, 2006 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) के अधिकारियों ने उन्हें एक मामले में गिरफ्तार कर लिया। पंकज ने पुस्तक में इस मामले को झूठा और मनगढ़ंत बताया है। पंकज को दो महीने झारखंड के रांची स्थित केंद्रीय जेल में रहना पड़ा।
इसके बाद लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जिसमें बार-बार सुनवाई, स्थगन, गवाहों के बयान और कई कानूनी एवं विभागीय जटिलताएं सामने आईं। मामला 13 साल से अधिक समय तक चला और अंततः विशेष सीबीआई अदालत ने 30 नवंबर, 2019 को पंकज को बरी कर दिया।
इस मामले ने पंकज की पत्नी श्वेता सिन्हा की जिंदगी भी बदल दी।
लेखक के अनुसार, भौतिकी में स्नातक और वित्त में एमबीए श्वेता मामले की सुनवाई की प्रक्रिया से परेशान हो गईं और उन्हें लगा कि उन्हें खुद कानून समझने की जरूरत है। इसके बाद श्वेता ने कानून की पढ़ाई की और वकालत शुरू कर दी। श्वेता ने मामले को समझने और वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई लड़ने में सक्रिय भूमिका निभाई।
लेखक ने पुस्तक का शीर्षक ‘माई लेडी इन ब्लैक’ अपनी पत्नी श्वेता को ही समर्पित किया है।
भाषा शफीक नरेश
नरेश