शिक्षा के माध्यम से अतीत को संरक्षित कर रहा है नगा समुदाय, भविष्य की तैयारी कर रहा: मोदी

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शिक्षा के माध्यम से अतीत को संरक्षित कर रहा है नगा समुदाय, भविष्य की तैयारी कर रहा: मोदी

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  • Publish Date - March 29, 2026 / 05:02 PM IST,
    Updated On - March 29, 2026 / 05:02 PM IST

नयी दिल्ली, 29 मार्च (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को नगालैंड की पारंपरिक मोरूंग शिक्षा प्रणाली की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रथा के माध्यम से बच्चों में गणित और विज्ञान जैसे विषयों में रुचि पैदा की जा सकती है।

नगालैंड की मोरूंग प्रणाली एक पारंपरिक सामुदायिक शिक्षा मॉडल है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन कौशल सीखने के केंद्र के रूप में कार्य करता है।

मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कहा कि नगा समुदाय शिक्षा के माध्यम से अतीत को संरक्षित करने और भविष्य को तैयार करने का एक प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस समुदाय के लोग अपनी आदिवासी परंपराओं का बहुत सम्मान करते हैं तथा वे इस पर गर्व तो करते ही हैं, साथ ही अपने रुख को आधुनिक भी रखते हैं।

उन्होंने कहा कि नगा जनजाति में मोरूंग शिक्षा की एक पारंपरिक व्यवस्था थी, इसमें, बुजुर्ग लोग अपने अनुभवों से युवाओं को पारंपरिक ज्ञान, इतिहास और जीवन के कौशल के बारे में बताते थे।

उन्होंने कहा, ‘‘समय के साथ यह प्रणाली अब मोरूंग की शिक्षा की अवधारणा

में बदल गया है। इसके माध्यम से बच्चों में गणित और विज्ञान जैसे विषयों में रुचि पैदा की जाती है।

मोदी ने कहा, ‘‘इसमें समुदाय के बुजुर्ग उन्हें कहानियां, लोकगीत और पारंपरिक खेलों के साथ जीवन के कौशल सिखाते हैं। इस तरह हमारा नगालैंड अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए, बच्चों की शिक्षा को आगे ले जा रहा है। आपको भी अपने क्षेत्र में ऐसे प्रयासो के बारे में पता चले, तो मुझे जरूर साझा कीजिएगा।’’

प्रधानमंत्री ने नगालैंड के चिजामी गांव से सामने आए एक बेहद प्रेरणादायक प्रयास के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि चिजामी गांव की महिलाएं मिलकर 150 से अधिक तरह के पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रख रही हैं। उन्होंने कहा कि इन बीजों को एक सामुदायिक बीज बैंक में संरक्षित किया जा रहा है, जिसे गांव की महिलाएं ही चलाती हैं।

उन्होंने कहा कि ‘‘इनमें चावल, बाजरा, मक्का, दालें, सब्जियां और कई तरह की जड़ी-बूटियां शामिल हैं। यह एक ऐसा प्रयास है, जिसमें ज्ञान भी सुरक्षित है, परंपरा भी जीवित है और आने वाली पीढ़ियों के लिये एक मजबूत आधार भी तैयार हो रहा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब ऐसे प्रयास हमें यह बताते हैं कि समाधान हमेशा कहीं दूर नहीं होता। कई बार हमारे अपने पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक प्रयास ही हमें सबसे मजबूत रास्ता दिखाते हैं।’’

भाषा

अमित रंजन

रंजन