नयी दिल्ली, आठ जुलाई (भाषा) कक्षा आठ के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की ओर से जारी सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक में भेदभाव के आधार में जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, विकलांगता और पहचान संबंधी अन्य पारंपरिक कारकों के साथ-साथ “आर्थिक पृष्ठभूमि” को भी शामिल किया गया है।
एनसीईआरटी ने न्यायपालिका को कथित तौर पर बदनाम करने को लेकर उपजे विवाद के कुछ महीनों बाद कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक ‘समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे’ जारी की।
संशोधित पाठ्यपुस्तक में विवादित हिस्सों के साथ-साथ अदालतों में लंबित मामलों और दो अहम न्यायिक फैसलों से जुड़े संदर्भों को हटा दिया गया है, जबकि जनहित याचिका, न्यायाधिकरणों और वैकल्पिक विवाद निपटान तंत्र से संबंधित नयी सामग्री शामिल की गई है।
संशोधित पाठ्यपुस्तक में कई और बदलाव भी किए गए हैं।
‘नागरिकता : अधिकार और कर्तव्य’ शीर्षक वाले अध्याय में कहा गया है, “भेदभाव का मतलब किसी व्यक्ति या समूह के साथ उनकी जाति, धर्म, नस्ल, विकलांगता, शारीरिक बनावट, लैंगिकता, लैंगिक रुझान या आर्थिक पृष्ठभूमि के कारण बुरा बर्ताव करना है। यह न केवल अनैतिक है, बल्कि कानूनी रूप से प्रतिबंधित भी है।”
इसमें कहा गया है, “वंचित परिवारों के बच्चों को उनके रूप-रंग, लिंग, लैंगिक रुझान या अन्य व्यक्तिगत विशेषताओं के साथ-साथ आर्थिक स्थिति के आधार पर भी पूर्वाग्रह और असमान व्यवहार का सामना करना पड़ सकता है।”
यह संशोधन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम, 2026 को अधिसूचित किए जाने के बाद भेदभाव की परिभाषा को लेकर छिड़ी तीखी बहस के बाद किया गया है।
यूजीसी की ओर से अधिसूचित नियमों में धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या विकलांगता के आधार पर किए जाने वाले अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार को भेदभाव के तौर पर परिभाषित किया गया है। हालांकि, इनमें आर्थिक पृष्ठभूमि या आर्थिक रूप से पिछड़े होने को स्पष्ट रूप से सुरक्षित श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।
फरवरी में एनसीईआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ खंड को लेकर विवाद खड़ा हो गया था।
उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पाठ्यपुस्तक की मुद्रित और डिजिटल प्रतियां वापस ले ली गई थीं और एनसीईआरटी ने इस मामले में माफी भी मांगी थी।
शीर्ष अदालत ने उक्त पाठ्यपुस्तक के प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर “पूर्ण प्रतिबंध” लगा दिया था। न्यायालय ने कहा था कि इसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित “आपत्तिजनक” सामग्री शामिल है।
संशोधित पाठ्यपुस्तक के आभार खंड में कहा गया है कि इसका प्रकाशन उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में की गई समीक्षा प्रक्रिया के बाद किया गया है।
इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत के 16 मार्च के आदेश में दिए गए निर्देशों के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने अध्याय चार ‘समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ को “फिर से लिखा” है।
भाषा पारुल नरेश
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